
निर्मल वाणी बोलिए,और बाँटिए प्यार।
गले लगाकर दीन को,करिए सद्व्यवहार।।
प्यार बढ़े संसार में, घटे घृणा दुर्भाव।
निर्मल मन सबका बने,खासा बढ़े लगाव।।
बोल बोलिए तौलकर,दिल का ताला खोल।
गैरों का मन मोह ले, अपने समझें मोल।।
निर्मल वाणी बोलिए,भेद कलुष को मार।
सबके दिल बहती रहे, जैसे गंगा धार।।
निर्मलता निज खो रही,देखो सरिता अद्य।
मानुष कचरा डालता, पीकर जैसे मद्य।।
चनरेज राम अम्बुज
आजमगढ़ उत्तर प्रदेश
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