
ऐसे कब तक चलेगा,
बेचारा आम आदमी,
कहाँ जाएगा,क्या करेगा?
हे सर्वशक्तिमान्!
मेरी बातों को
अन्यथा न लीजिए।
बुरा लगा गर आपको,
पकड़ता हूँ कान,
प्लीज,माफ़ कीजिए।
दयानिधे! आपकी तो
सीमाएँ हैं अनंत।
संभावनाएँ हैं अपार,
मैं हूँ अदना सा आदमी,
दायरों में कैद,
आदतों से लाचार ,
बालक हूँ आपका ,
धीर मुझे दीजिए।
हे ईश! दयानिधान ,
विनती मेरी सुन लीजिए।
भगवानगीरी हुई बहुत
अब आदमी गीरी कीजिए।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली।




