साहित्य

ऐसे कब तक चलेगा

वीणा गुप्त

 

ऐसे कब तक चलेगा,

बेचारा आम आदमी,

कहाँ जाएगा,क्या करेगा?

 

हे सर्वशक्तिमान्!

मेरी बातों को

अन्यथा न लीजिए।

बुरा लगा गर आपको,

पकड़ता हूँ कान,

प्लीज,माफ़ कीजिए।

 

दयानिधे! आपकी तो

सीमाएँ हैं अनंत।

संभावनाएँ हैं अपार,

मैं हूँ अदना सा आदमी,

दायरों में कैद,

आदतों से  लाचार ,

बालक हूँ आपका  ,

धीर मुझे दीजिए।

 

हे ईश! दयानिधान ,

विनती मेरी सुन लीजिए।

भगवानगीरी हुई बहुत

अब आदमी गीरी कीजिए।

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली।

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