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जाग बन्धु! जाग अब!

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा "अकिंचन "

कर चुके बहुत शयन,देख खोल कर नयन,
हो चुका विहान और, ज्योति का प्रसार है।
छोड़ नयन भींचना औ’ उर्ध्व श्वांस खींचना,
जाग बन्धु जाग अब,समय की यह पुकार है।।
हिरण्यगर्भ ज्योत्सना,प्रभा की है ये व्यंजना,
अरुणिमा छिटक रही ,गगन में नव निखार है।
है अब न तमा अर्गला,वर लो ज्योति श्रृंखला,
होश्रृंखला में बद्ध तुम,समय की यह पुकार है।।
चेत बन्धु चेत तुम,क्यों खो रहे,निज चेतना,
वितान तान सो रहे, हो रहा विकट प्रहार है।
हो श्वान पुत्र तुम नहीं, तुम नहीं श्रृँगाल हो,
हे सिंह पुत्र तुम उठो,समय की यह पुकार है।।
तुम हीन भाव को तजो,औ’ उच्च भाव में पगो,
है श्रेष्ट आर्यभूमि ये,हे मनुज श्रेष्ठ!तुम आर्य हो।
थे अग्रगण्य प्रतीक, तुम रहे, स्वर्णिम अतीत में,
प्रतीक बन के पुनि उठो,समय की यह पुकार है।।
मिष सुरा की संहिता, है त्याज्य बिन्दु मर्दिता,
तज दो बन्धु तुम इसे, जो निम्नतम आचार है।
भ्रष्टपथ को छोड़कर,कर लो फिर से नव सृजन,
नवसृजन का पथ पकड़,समय की यह पुकार है।।
एक कुल का ज्योति सुत,दो कुलों की है सुता,
हाट मे न सुत बिके,जन समग्र की ये पुकार है।
दहेज रूप सर्प आज, है ग्रस रहा समाज को,
समाज को उबार लो,समय की यह पुकार है।।
है अजेय वही राष्ट्र बन्धु,जिसमें होगा संगठन,
हम संगठित सुबद्ध हों, ये जग नहीं उदार है।
है याचना की नीति तो, बालुका की भित्ति सा,
बढ़के हक को छीनलो समय की यह पुकार है।।
✍️ चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन ”
चलभाष 9305988252

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