
मेरे गाँव की मिट्टी बड़ी प्यारी लागे,
हर कण में जैसे ममता की धारा जागे।
खेतों की हरियाली गीत सुनाए,
पवन में घुलकर खुशबू मुस्काए।
सुबह की किरणें जब आँगन छूती,
चिड़ियों की बोली मन को लुभाती।
गायों की घंटी मधुर बजती,
गाँव की गली जैसे गाथा कहती।
पीपल की छाँव में बैठकी होती,
बुजुर्गों की बातें ज्ञान संजोती।
हँसी-ठिठोली से दिन सँवरता,
हर रिश्ता दिल से दिल तक उतरता।
त्योहारों में रंग बिखर जाते,
ढोल-नगाड़े खुशियाँ गाते।
माटी की खुशबू दिल को भाए,
सादा जीवन सच्चा सुख लाए।
मेरे गाँव की ये अपनी कहानी,
संस्कृति में बसती हर एक निशानी।
शहर की चकाचौंध भले ही लुभाए,
पर गाँव की मिट्टी ही मन को भाए।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




