
रिश्तों की कहानियां अक्सर
छूट जाती है साथ मिलकर
जैसे लिखी हो कविता कोई
बिना शब्द और बिना अक्षर
जैसे लिखा हो गीत कोई
बिना छंद और बिना स्वर
जैसे बहती हो नदी कोई
बिना जल के आखिर निरंतर
जैसे छाया हो कोहरा घना
ना दिखे पर सामने अंबर
जैसे मुंह करवाने मीठा
लाए कोई नमकीन चखकर
वैसे जीवन बन जाता पत्थर
रिश्तों में जो आए अंतर
आखिर मिट जाती कहानियां
जो छोड़ जाये साथ मिलकर
कवि,गीतकार-धीरज कुमार शुक्ला’दर्श’
ग्राम -पिपलाज, तहसील -खानपुर, जिला झालावाड़ राजस्थान




