
दिल से मिटेगा अंधेरा तब तक नहीं
पड़ेगी प्रेम की रोशनी जब तक नहीं
खिड़कियां भी जब तक खुलती नहीं
तब तक देता उजाला भी दस्तक नहीं
यह जो तुम्हारी आंखें है झील सी
चुभती है किसी को यह कील सी
नैनो ने तुम्हारे वह सब कह दिया
होठों से कहोगी तुम कब तक नहीं
दिल से मिटेगा अंधेरा तब तक नहीं
पड़ेगी प्रेम की रोशनी जब तक नहीं…….
ये दिल तुम्हारा रह जाए ना कुंवारा
ऐसा ना हो कभी सुझाव है हमारा
प्रेम का उत्तर दे देना तुम प्रेम से
जो तुमने दिया हैअभी तक नहीं
दिल से मिटेगा अंधेरा तब तक नहीं
पड़ेगी प्रेम की रोशनी जब तक नहीं ……..
मुखड़े पे तेरे जो गिरते हुए बाल हैं
वह प्रेम के लिए आतुर है बेहाल है
शरीर केअंग भी समझाते हैं तुझे
समझे तुम क्यों यह अब तक नहीं
दिल से मिटेगा अंधेरा तब तक नहीं
पड़ेगी प्रेम की रोशनी जब तक नहीं
खिड़कियां भी जब तक खुलती नहीं
तब तक देता उजाला भी दस्तक नहीं
पंडित पुष्पराज धीमान भुलक्कड़
गांव नसीरपुर कला हरिद्वार उत्तराखंड




