साहित्य

तेरे मगर हबीब

कनक

तेरे मगर हबीब नसीबो में दम नहीं
महफ़िल में आप के तो पड़े ना क़दम नहीं।।

तुझ बिन तो हम में कुछ भी न बढ़ते हैं ये कदम
घायल हुआ मैं आज अश्क़ पास हम नहीं।।

कहता रहा हूं जो सच कहा यार कुछ हमने
फ़िर भी मुबाहिसों का उसे शौक़ कम नहीं।।

हरदम लड़ा उससे ही बन राह हो जफा
हैं कसम यार आज मुझे ख़ास हम नहीं।।

ऐसा न लगता क़दम उठा के गिरा वही
हैं ख़ास तौर का कहर किस्सा बहम नहीं।।

कनक

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