साहित्य

ग़ज़ल_ ढली उल्फत जो अश्कों में

सुन्दर लाल मेहरानियाँ

नहीं अब पास आते ये,हिचकने हैँ लगे रिश्ते।
पनाहो में जो गैरों के,बिलखने हैं लगे रिश्ते।

लगे लगने न जाने क्यों,यहाँ पर अपने बेगाने,
पलों में टूटकर अब तो,बिखरने हैं लगे रिश्ते।

लुटा देते थे जो हर सब बिना माँगें ही इक पल में,
#मुहब्बत वो कहाँ खोई,सिसकने हैं लगे रिश्ते।

समन्दर भी प़डा फीका,जो देखा ममता का सागर
कहीं मिल जाए वो आँचल,तरसने हैं लगे रिश्ते

भुला देते थे ‘दर्दे दिल’,किसी आगोश में आकर,
वही #दामन जो पाने को,मचलने हैं लगे रिश्ते।

अदावत यूँ लगी बढने,मुहब्बत क्या करे कोई,
ढली उल्फत जो अश्कों में,छलकने हैं लगे रिश्ते।

लगे छाने घटा,जब भी #हवस के बादलों की ‘देव’
कहीं शर्मो-हया सारी,निगलने हैं लगे रिश्ते।

✍️ सुन्दर लाल मेहरानियाँ,_राजस्थानी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!