साहित्य

हो गया सब कुछ होते होते

देवेन्द्र सिंह गुड्डु

हो गया सब कुछ होते होते
खो गई निंदिया खोते खोते
चुप नहीं कराने वाला कोई
चुप हो जा रे… मन रोते रोते

बिगड़ा खेला….उजड़ा मेला
तू भी अकेला मैं भी अकेला
नसीब ने हमको दूर धकेला
काम न आया पूरा अधेला
थक गयी हिम्मत थक गई रे
भार दुखों का….. ढोते ढोते

त्रिवेणी की….धार अलग हो
संगम कहना इसे गलत है
हो सकता है राग विलग हो
अनुमानों का. .ए भी मत है
तू बड़ी मैं में. दुखता रग हो
पाप पुण्य को. . धोते धोते

होते शाम तकदीर पे रोती
अपने मन के नीर पे रोती
गिर गुंछा के होंठों पर भी
बन पाई न शबनम मोती
बीज करम का.. .बोते बोते
Devendra singh guddu Sultanpur

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