साहित्य

कहानी संध्या

नीलम अग्रवाल "रत्न"

आश्विन मास आने वाला था।मंदिर का रंग – रोगन शुरू हो गया था।मंदिर में स्थापित मूर्तियों की साफ – सफाई , नए कपड़े सब बनने दे दिए गए थे। नवरात्रि का पूरे कैम्पस के लोगों को बेसब्री से इंतजार होने लगा था।
क्योंकि इस साल कैम्पस की नवरात्रि महोत्सव में दुगुना मजा आने वाला था।कारण था कि मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ था।पहले से बड़ी मूर्तियांँ स्थापित होने वाली थीं।
यूंँ तो हर साल ही दोनों नवरात्रि में नौ दिन भजन संध्या होती,उसके बाद संध्या आरती कर प्रसाद वितरण होता था।जितनी भी भजन प्रेमी बहनें थी,पांँच बजते ही सब पहुंँच जाती।अपने -अपने कल्चर के भजन सुनाती।हर क्षेत्र के लोग रहते थे।तो अलग -अलग भाषा में भजन सुनने को मिलते।
जैसे कोई मैथिली भाषा में गाता तो कोई पंजाबी में। इसी तरह बिहारी ,भोजपुरी, राजस्थानी सभी अपनी -अपनी भाषा में भजन गाकर भक्तों को रिझाने की कोशिश करती।
नवरात्रि शुरू होते ही भजन संध्या आरती शूरू हो गई।रोज अलग अलग रंग की साड़ी का ड्रेस कोड रखा गया।मंदिर के संस्थापक ने एक सरप्राईज रखा था। षष्ठी की संध्या भजन में बताया गया कि कल से कैम्पस में तीन दिन का मेला लगने वाला है। जिसमें दुर्गा जी का भव्य पंडाल सजेगा।
जैसे ही सबको पता चला,सबके चेहरे पर अजीब सी उमंग छा गई।दूसरे दिन बच्चों की जो मस्ती देखने को मिली – आ हा हा।इस रौनक का तो कहना ही क्या !
इन तीन दिनों की भजन संध्या के लिए बाहर से गायक को बुलाया गया था।संध्या होते ही जो भजनों की गंगा बहनी शुरू हुई। इतना आनन्द आ रहा था कि वहांँ से उठने का मन ही नही कर रहा था।
उसके बाद से हर कीर्तन में उस संध्या के आनन्द
की चर्चा जरूर होती है।

नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर 🙏🙏

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