
मैं भी कलमकार हूँ, शब्दों का रखवाला,
हिंदी की माटी में पला, भावों का उजियाला।
मेरी कलम से बहती है संस्कृति की धारा,
तुलसी–कबीर की राहों ने मुझे संवारा।

स्याही नहीं, ये आत्मा की सच्ची पुकार है,
हर अक्षर में छुपा हुआ देश का संस्कार है।
छंदों में ढलती पीड़ा, गीतों में विश्वास,
हिंदी साहित्य है मेरा पहला और आख़िरी श्वास।
जब बोल नहीं पाते लोग, तब कविता बोलती है,
टूटे हुए सपनों को भी जीना सिखा देती है।
कभी विद्रोह बन जाती, कभी बनती है प्रीत,
कभी क्रांति की चिनगारी, कभी भजन का गीत।
मैं भी कलमकार हूँ, कलम मेरी तलवार,
अज्ञान के अंधेरों पर करती सीधा वार।
न मंच की चाह मुझे, न पुरस्कारों का मोह,
बस हिंदी ज़िंदा रहे—यही मेरा संकल्प, यही जोश।
आओ साथ गुनगुनाएँ, शब्दों का ये संसार,
कविता लिखना छोड़ें नहीं, चाहे बदले दौर हज़ार।
जब तक साँसों में लय है, जब तक दिल में प्यार,
हिंदी साहित्य लिखेगा—हर युग का इतिहास अपार।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




