साहित्य

पत्थर हो गए इंसान

मीनाक्षी सुकुमारन

आधुनिकता बनाम दिखावा, नाम,
पहचान, रुतबा, शोबाज़ी, पैसा, बंगला,
गाड़ी ने इंसान को शैतान से हैवान
बना दिया है।।
बढ़ गया अत्याचार, हिंसा, शोषण,
हैवानियत खो चुकी सभ्यता, सद्बुद्धि, सद्भावना, प्रेम, नीति, रीति
दम तोड़ती मानवता आदमी
हुआ लाचार यूँ भूला फर्फ़
सच झूठ, पाप पुण्य, सतकर्म दुष्कर्म।।
यूँ लुप्त हो चुकी इंसानियत
पत्थर हो गए इंसान
बदल गई लोगों की फितरत,
उनकी सोच, उनका नज़रिया
इंसान की खाल में बना भेड़िया
करता शिकार दे चोट मानसिक, शारीरिक
समाज हुआ ग्रस्त चोरी, लूटपाट,
धोखाधड़ी, अपहरण, बलात्कार, हत्या
जैसे बर्बर अपराधों से।।
पर कांपती नहीं रूह इन
बाहुबलीयों और उनके आसरे
पल रहे पापियों की
रहा न किसी तरह का खौफ कोई।।
दूसरी तरफ अपना अपने का हुआ दुश्मन
खून का रंग पड़ने लगा सफेद
नैतिकता का रहा कोई मोल नहीं ।।
यूँ लुप्त हुई मानवता क्या घर,
क्या समाज, देश से भी
कोई किसी को नहीं देख रहा
बस सबको पड़ी है अपनी अपनी इस तरह सिसक रही इंसानियत मानवता हर ओर
पत्थर हो गए इंसान न कदर जीवित
की न मृत की ।।
सड़क पर दुर्घटना में घायल,
खून से लथपथ या मृत
वीडियो ज़रूर बनाएंगे
पर मदद के लिए कोई आगे नहीं बढ़ेगा
ये तो हाल हुआ पत्थर हो गए इंसान
और पत्थर दिल दुनिया का बस तमाशाई
बन रील रहते बना हो मसला , हादसा
कोई भी , कहीं भी।।
….मीनाक्षी सुकुमारन
नोएडा

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