
धड़कन इन्सान की ज़ुबान हो गई
ज़िन्दगी की शुरुआत हों गई!!
लफ़्ज़ खामोश रहे दरमियांँ
दिल की दिल ही में बात हो गई!!
उनके सितम ना-क़ाबिल-ए-बर्दाश्त थे
आज पत्थर दिल से बात हो गई!!
धड़कने दूर तक उनकी सुनाई देती है
आंँखों ही आंँखों में बात हो गई!!
तुम जब पहले-पहल मिले थे
यूँ लगा ज़िन्दगी की शुरुआत हो गई!!
सात जन्मों का वचन भी निभाया
अंधेरे में रोशनी की शुरुआत हो गई!!
परिवार क्या होता है सीखा हमने
तुम परिवार की जान हो गई!!
धर्म,अर्थ, काम,मोक्ष, होते हैं पुरुषार्थ
आज उनसे ही दिल की बात हो गई!!
सुकून मिलता है एक तेरे आने से
लगा गुलशन में जैसे बहार हो गई….
राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




