
तन-मन हर्षित है धरती का, आया मास वसंत।
नव कलिकाएँ मुखपट खोलें, डोले भ्रमर जयंत।।
है परिधान हरित धरती का, मस्तक चुनरी पीत।
मध्यम मन्द्र तार झोंकों सँग,पवन छेड़ता गीत।।
ग्रहण आचमन सूर्य रश्मि कर, अंबर बना महंत।
तन-मन हर्षित है धरती का, आया मास वसंत।।
उर पिघला जब हिममानव का, कल-कल गूँजा नाद।
अपने प्रियतम से मिलने को, नदी बढ़ाए पाद।।
अंगीकृत कर प्रेम प्रिया का, हुआ सिंधु श्रीमंत।
तन-मन हर्षित है धरती का, आया मास वसंत।।
खग-विहगों ने झाँक नीड़ से, ऊँची भरी उड़ान।
सृष्टि प्रफुल्लित होकर करती, जीवन का ऋतुदान।।
शोक नाश करता जग भर का, है वसंत दुष्यंत।
तन-मन हर्षित है धरती का, आया मास वसंत।।
डॉ ऋतु अग्रवाल
मेरठ, उत्तर प्रदेश




