
रात के साढ़े ग्यारह बज गए थे । सुरुचि की बेचैनी बढ़ती जा रही थी । दो साल का बेटा पापा – पापा की रट लगाए हुए था । बड़ी मुश्किल से किसी तरह उसे तो सुला दिया था । लेकिन सुरुचि की आंँखों में नींद की जगह चिंता उमड़ रही थी ।
वह अपने आप में ही बड़बड़ाए जा रही थी – विपिन ये कैसी लत लगा ली आपने । आज फिर पता नहीं आप कितना हारेंगे । धीरे -धीरे जमा पूंँजी भी कम हो रही है । हे भगवान मैं कैसे समझाऊंँ आपको !
अभी वो ये सब सोच ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बजी । सुरुचि ने दौड़ कर दरवाजा खोला । सुरुचि को देखते ही विपिन ने नजरें झुका ली । सुरुचि को समझते देर नहीं लगी । उसने चिल्लाते हुए कहा, विपिन आज फिर से हार के आए हो ?
कितना हारे हो मुझे बताओ ?
ये जुआ तुम्हें ले डूबेगा ।
तुम्हारी अकेले की जिंदगी बर्बाद नहीं हो रही है !
तुम्हारे साथ मेरा और मेरे बच्चे का भविष्य भी जुड़ा है ।सुरुचि गुस्से में रोती जा रही थी और विपिन पर चिल्लाए जा रही थी ।
विपिन अगर तुम्हारा ऐसे ही चलते रहा तो एक दिन हम सड़क पर आ जायेंगे !
ये सुनकर विपिन ने बात को समझने की जगह चिल्लाते हुए कहा, तो जाओ ! बैठ जाओ सड़क पर अभी से कटोरा लेकर । किसने रोका है । एक कटोरा अपने बेटे को भी थमा देना । जाओ निकलो यहांँ से ।
यह बोलकर विपिन सोने चला गया । थोड़ी देर में उसने बिस्तर पर टटोला तो बगल में बेटे और सुरुचि दोनों ही नहीं थे । वह घबराकर दूसरे कमरे में गया वहांँ भी कोई नहीं था । दरवाजा खुला था । तभी टेबल पर रखे पेपर पर उसकी नजर गई । उसने उठाकर जैसे ही पढ़ा – सुरुचि बेटे को लेकर घर छोड़कर जा चुकी थी । यह पढ़ते ही उसके होश उड़ गए । वह वहीं पर दोनों हाथों से सिर पकड़ कर बैठ गया और बड़बड़ाने लगा, हे भगवान ये मैंने क्या कर दिया ।
नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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