साहित्य

हमारा रंगीन अस्पताल

रंजीता निनामा

पास के अस्पताल ने आज फिर शोर मचा दिया,
भाई, इन्होंने तो टेरेस को ही बगीचा बना दिया।

सुबह-सुबह उल्टी का अलार्म बज जाता है,
फिर नारियल पानी तोड़ने का साज़ सज जाता है।

जब मैं योगा करने बैठती हूँ आराम से,
तभी वॉशरूम की बदबू आ जाती है धाम से।

चार कदम नीचे झाँक कर देखा हाल,
वहाँ पड़ा था जूठा खाना और कचरे का जाल।

लोग सुबह उठकर भगवान के दर्शन करते हैं,
हम सुबह उठते ही मक्खियों के दर्शन करते हैं।

पढ़ना और सोना भी हो गया है मुश्किल,
जोर-जोर से मोबाइल और बातें… सब कर देते हैं मुश्किल।

हर तरफ पान और गुटखा का रंगीन कमाल,
दीवारें भी लगी हैं जैसे पेंट का धमाल।

आओ देखो ज़रा यह निराला हाल,
यही है मेरे पास का आज़ाद अस्पताल।

जहाँ गंदगी करती है धमाल,
और बन गया है “रंगीन अस्पताल”!

रंजीता निनामा
झाबुआ (म. प्र.) ✨

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