
नव संवत्सर का पावन क्षण, चेतना का जागरण,
जग में फिर से गूँज उठा माँ का दिव्य आवाहन।
श्रद्धा के कोमल पुष्प लिए, पहुँचा तेरे द्वार,
हे मां! तेरी कृपा से ही सजे जीवन संसार।
पावन कलश में विराजे तू, उस दिव्य घट के भीतर,
हर कण में तेरा वास, हर श्वास में तेरा स्वर।
नवदुर्गा के नौरूप में, अनंत तेरा विस्तार,
सृजन, पालन, संहार में, तेरा ही है अधिकार।
कभी धरा पर सौम्य स्वरूप, ममता का विस्तार,
कभी धारण कर लेती रौद्र, करती दुष्ट संहार।
जब अधर्म बढ़ता जग में, तू बन जाती काली,
तेरी ज्वाला से कांपे जग, मिटे अंधेरी लाली।
तेरे चरणों में झुककर ही मिलता सच्चा ज्ञान,
तेरी भक्ति से ही खिलता जीवन का वरदान।
नव वर्ष में दे माँ ऐसी निर्मल सी पहचान,
मन हो पावन, कर्म हो उज्ज्वल, जीवन बने महान।
जय माँ जगदम्बा! जय शक्ति स्वरूपा!
अतुल पाठक
हाथरस(उत्तर प्रदेश)



