
अगर दीवारें बोलतीं ,तो कह देती अपने मन की व्यथा
अनसुने से कुछ ऐसे किस्से या किसी के मन
की कथा
वो बताती एक लाचार बेबस औरत की कहानी
समाज की नजरों से कैसे खुद की बचाती रहती जवानी
अगर दीवारें बोलतीं तो खींच देती आंखों के समाने वो मंजर
चुभते कचोटते हवस की खातिर एक नारी को नोचते खंजर
वो बताती तुम्हें एक बूढ़े मां बाप की उम्र भर का हिसाब
अपनी औलाद की लिए दफन की अपने सपनों की किताब
अगर दीवारें बोलतीं तो बताती एक नवयुगल जीवन की वो पहली रात
सुंदर सपनों और ख्वाबों की मोहब्बत में डूबीं बात
वो बताती तुम्हें दर्द में तड़पती एक मां की प्रसव पीड़ा का अहसास
नवजीवन को जन्म देने खुद मौत से लड़ने का वो जज्बात
अगर दीवारें बोलतीं तो कह जाती है एक ऐ पुरुष का मौन असहाय दर्द
जो मन ही मन ख़ुद को संभालते, लड़ते, आंखों में हजारों आसूं छिपाए जीवन संघर्ष
अगर दीवारें बोलतीं तो खींच लाती वो मर्द के सीने में रोता
जिसमें उन पर लगा दिया जाता मर्द का ठप्पा कि मर्द को कभी दर्द नहीं होता
अगर दीवारें बोलतीं,,,,
प्रिया काम्बोज प्रिया ✍️ स्वरचित रचना
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




