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बेवजह बहस से बहस जीतती रिश्ता हार जाता है।
कटुता भी आ जाती और अपनापन बाहर जाता है।।
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मार्गदर्शन जरूर करिए देकर सटीक ठोस प्रमाण।
बस यूं ही बहस मत करिए कर के रिश्तों से संग्राम।।
अपनों से तो हार कर भी आदमी जीत जाता है।
बेवजह बहस से बहस जीतती रिश्ता हार जाता है।।
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किसी का सरल सहज स्वभाव कमजोरी नहीं होती है।
क्रोध में करना बातचीत संस्कारविहीन मुँहजोरी होती है।।
बरसों का बनाया रिश्ता पल भर में ही बेकार जाता है।
बेवजह बहस से बहस जीतती रिश्ता हार जाता है।।
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दोस्ती निभानी है तो काँटो से भी तालमेल सीखना होगा।
देखना है मित्रता का इंद्रधनुष तो बारिश में भीगना होगा।।
सुनाकर नहीं सुनकरआदमी रिश्तों के दरिया पार जाता है।
बेवजह बहस से बहस जीतती रिश्ता हार जाता है।।
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रचयिता।।एस के कपूर”श्री हंस”
बरेली।।
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