
ये पड़े प्रसून पृथ्वी पे प्रभु परशुराम पधारे हैं ।
अन्यायी थे नृपत जो भी वही इनने संहारे हैं।।
अच्युत के आप अवतारी आज अवनी पर आए थे ।
ऋषि मुनि जो तपस्यारत आप सबही को भाए थे ।।
नहाने ब्रह्म बेला में आते गंगा किनारे हैं ।
……………………………………………1
भृगु कुल वंश भास्कर हो उजाला उर में कर दीजे ।
दुखी जो ब्राह्मण पृथ्वी पर दया की दृष्टि अब कीजे ।।
द्विज का दूसरा नहीं कोई आपके ही सहारे है ।
……………………………………………..2
आपके शिष्य धनुष धारी , आपकी कीर्ति है न्यारी ।
चिरंजीवी हो प्रभु तुम हो , नाज हमको भी है भारी ।।
रेणुकानन्दन सहस्त्रवंदन गूजते जय के नारे है ।
……………………………………………………3
अधिक दुखी विप्र धेनु हैं कृपा की दृष्टि प्रभु कीजे ।
विप्र सब कर रहे विनती , शरण में आप ले लीजे ।।
मक्खन मनसे नमन करते आप जिनके प्यारे हैं।
……………………………………………………4
डा राजेश तिवारी मक्खन
झांसी उ प्र




