
एक पिता और उसकी बेटी का रिश्ता दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत और गहरे एहसासों में से एक है। किसी ने सच ही कहा है कि एक बेटी अपने पिता के लिए सिर्फ़ उसकी संतान नहीं होती, बल्कि उसके दिल की धड़कन और उसके घर की वह रौनक होती है जिसे ‘घर की ज़ीनत’ कहा जाता है।
पिता का गौरव और संबल होती हैं बेटियां,
एक पिता के लिए उसकी बेटी उसकी सबसे बड़ी पूँजी होती है। जहाँ दुनिया को लगता है कि बेटियाँ नाज़ुक होती हैं, वहीं एक पिता जानता है कि उसकी बेटी उसकी सबसे बड़ी ताक़त है। “बाबा की लाडली” होना सिर्फ एक संबोधन नहीं, बल्कि एक अटूट विश्वास है। बेटियाँ अपने पिता के थके हुए चेहरे पर मुस्कान लाने का हुनर बख़ूबी जानती हैं।
संस्कारों की खुशबू समाहित होती है इनमें,
जैसे फूल अपनी खुशबू से बगीचे को महका देता है, वैसे ही बेटियाँ अपने संस्कारों और अपनी उपस्थिति से घर के वातावरण को पवित्र और ख़ुशहाल बनाए रखती हैं। पिता की आँखों का तारा बनकर वे न केवल घर को संभालती हैं, बल्कि अपने पिता के मान-सम्मान को भी नई ऊंचाइयों पर ले जाती हैं।
एक अनकहा जज्बाती रिश्ता होता है अपनी बेटियों के साथ माता पिता का,
बेटियाँ और पिता अक्सर एक-दूसरे से बहुत कुछ नहीं कहते, लेकिन उनकी खामोशियाँ भी एक-दूसरे का हाल जान लेती हैं। पिता अपनी बेटी की सुरक्षा के लिए पूरी दुनिया से लड़ सकता है, और बेटी अपने पिता की साख के लिए अपनी खुशियों को भी सहेज कर रखती है। यह रिश्ता त्याग, प्रेम और अटूट भरोसे की नींव पर टिका होता है।
घर की रौनक और बरक़त होती हैं बेटियां,
कहा जाता है कि जिस घर में बेटियों की हंसी गूँजती है, वहाँ बरक़त और खुशियाँ ख़ुद-ब-ख़ुद चली आती हैं। वे उस ठंडी छाँव की तरह होती हैं जो जीवन की कड़ी धूप में पिता को सुकून देती हैं।
बेटियाँ फूलों की तरह कोमल भी हैं और चट्टानों की तरह मज़बूत भी। एक पिता के लिए उसकी दुनिया तब मुकम्मल होती है जब उसकी बेटी मुस्कुराती है। “बाबा की बेटियाँ” समाज का वह आधार हैं जो प्यार और रिश्तों की डोर को मज़बूती से थामे रखती हैं।
सलामत रहें वो बेटियाँ, जो अपने बाबा के आंगन को जन्नत बनाए रखती हैं।
डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह सहज़
हरदा मध्य प्रदेश



