
मैं एक वरिष्ठ लेखक बनना चाह रहा था। ज्यादा दिन से नहीं लिख रहा हूँ पर मैं एक महत्वाकांक्षी लेखक हूँ। किसी ने कहा कि जो कुछ वरिष्ठ टाइप के लेखक हैं अगर उनका तेल मालिश तथा उबटन करो तो वरिष्ठ की खेती में तुम भी वरिष्ठता की उपज हो सकते हो।
यह बात जंच गयी। सुबह सबेरे देशी घी की बनी मिठाइयां तथा तेल उबटन लेकर एक वरिष्ठतम लेखक की कुटी में पहुंचते ही दण्डवत प्रणाम कर उनके हाथ पैर दबाना शुरू कर दिया और उबटन लगाकर मालिश की। शरीर में चिपकी हुई गंदगी को छुड़ाया और देशी घी के मिष्ठान से मुंह को मीठा कराया।
उन वरिष्ठ लेखक महोदय जी मेरी इस तरह की साहित्यिक सेवा से पूरी तरह से खुश हो गये। बिना मेरी रचना देखे ही तारीफों का पायजामा पहनाकर एकदम गंभीर और उत्कृष्ट लेखक बताया और मुझे वरिष्ठ लेखक कहकर संबोधित किया जिससे मेरी अंत: आत्मा तृप्त होती नजर आई।
वरिष्ठ लेखक महोदय को कुछ भारतीय नोटों का भी माल्यार्पण कर उनको एकदम अपना बना लेने के लिये कुछ जुगत लगाया। सभी तरह की गुणा गणित प्रयोग करते हुए उनको अपने पक्ष में कर लिया। वे समझ गये कि वरिष्ठ लेखक होने से दसों अंगुलियां देशी घी में डूबी रहती है।
इस प्रकार से उनको एक साहित्यिक मंच से अपनी तारीफों के लिए बुलाया। मुझे वरिष्ठ लेखक कहकर संबोधित किया। मेरी छाती चौड़ी हो गयी। अगले दिन से वरिष्ठ लेखक मेरे नामों के आगे लिखा जाने लगा।
मैं अखबारों की सुर्खियां बन गया। पूरे देश के वरिष्ठ साहित्यकारों में मै भी एक वरिष्ठ साहित्यकार तेल उबटन लगाकर तथा देशी घी का लड्डू खिलाकर वरिष्ठ लेखक की उपाधि प्राप्त की। तब से हमारा वरिष्ठ लेखक होने का जलवा कायम है।
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जयचन्द प्रजापति “जय’
प्रयागराज




