
अक्सर खुब सुरत लोग उह भ्रम में रहते हैं कि वो खूब सूरत है जबकि कोइ भी व्यक्ति हो वह तभी खूब सूरत लगता हैं जब वह बहुत खुश हो, तब उसकी खूब सुरती जो उस समय राग द्वेष चल कपट जाति धर्म आदि आदि सैकड़ों बैराग आलाप रही दुनिया से कोसों दूर होता जा और निर्विकार प्रसन्नता खूबसुरती में चार चांद लगा देती हैं यह सचमुच बहुत सुंदर और खूब सूरत लगता हैं फ़िर वह कोइ भी व्यक्ति हो यह सत् स्वीकार करना होगा
बिना खुशी और प्रसन्नता के कोई भी कितना ही खूब सूरत हो सब कुछ व्यर्थ है
इसी लिए कहां जाता है कि सदा ही प्रसन्न रहना ईश्वर की सच्ची आराधना,पूजा है
मुझे याद है उससे मेरी दोस्ती जो करीब चार पांच साल तक रही इन पांच साल में एक बार हम दोनों किसी महत्वपूर्ण कार्यक्रम में उपस्थित थे अतिथि के रूप में
एक गाड़ी में बैठ , आयोजन बहुत सफल यादगार था, अंत में बिदा होने पर मैने उसे देखा और बोला ठीक हैं फिर मिलते है तब वह बेहद खूब सूरत लगी जो इन पांच साल में कभी नहीं दिखी वज़ह यही थीं उसके चेहरे पर दस्तक देती निर्विकार प्रसन्नता और मेरे प्रति आस्था और आत्मा विश्वास यहीं वह समय था जब वह सचमुच बेहद अच्छी लगी रही थी
मेरा यह कहना हुआ कि, तुम अच्छी लग रही हो, मैने देखा इस शब्द मुखर होते ही मेरे वह अद्भुत खूब सूरत लगे रही थी जैसे साक्षात ईश्वर रूप हो , जैसे यह शब्द सुनने के लिए लंबे समय से वह इंतजार कर रही थी जो, एजे उसे नसीब हुआ
मेरे मुख से अनायास यह शब्द क्यों निकल आया वजह केवल वहीं थीं वह आज बेहद प्रसन्न थीं और यहीं प्रसन्नता खूबसुरती में चार चांद लगा रही थी
बहुत देर तक में सोचता रहा कि , वाकई कोई भी व्यक्ति हो यदि वह प्रसन्न और बहुत खुश होता हैं तो ईश्वर के सानिध्य में होता हैं और ईश्वर सदा ही प्रसन्न हो जीने वाले से बेहद प्यार करता है और खुश रहते हैं कि मैने उसे जीवन दिया वह खुश है जो सत्य को आज बहुत ही करीब से देखा था और महसूस किया कि
सदा ही प्रसन्न हो जीने को ईश्वर साधना और आराधना है
यह भी अहसास हुआ कि कोई भी व्यक्ति कितना ही खूब सूरत हो मन को आत्मा को स्पर्श नहीं कर पाता है जब तक वह प्रसन्न नहीं है खुश नहीं है यह सत्य स्वीकार करते हुए नींद लग गई कि खूब सूरत भी मोहताज होती हैं प्रसन्नता की
तभी वह खूब सुरती सार्थक लगती हैं प्रभावित करती है और दिल और दिमाग में दस्तक देती स्थाई बस जाती है
डॉ रामशंकर चंचल
झाबुआ मध्य प्रदेश




