
वो जो कभी नींव थी भरोसे की,
आज उसमें कुछ दरारें दिखती हैं,
बातें जो कभी खत्म नहीं होती थीं,
अब खामोशियों में बिकती हैं।
एक अनकहा फासला
न तुम गलत हो, न मैं गुनहगार हूँ,
बस वक्त के थपेड़ों का वार है,
कल तक जो साहिल था हमारा,
आज वही गहरा मँझधार है।
वो कांच सा टूटना
जैसे पुरानी दीवार का पलस्तर झड़ता है,
वैसे ही हर दिन थोड़ा मोह मरता है,
कोशिशें तो बहुत कीं पैबंद लगाने की,
पर धागा ही जब कच्चा हो, तो हाथ क्या करता है?
बर्फ होती भावनाएँ
हँसी अब सिर्फ चेहरे का श्रृंगार है,
भीतर तो बस बर्फ जमीं है,
सब कुछ तो है पास हमारे,
बस एक छोटी सी ‘रुह’ की कमी है।
डॉ. अनीता निधि, जमशेदपुर, झारखंड




