साहित्य

हो गया लहुलूहान ये दामन

मेहरानियाँ_ राजस्थानी

दर्द और कसक की वाहिनी है।
सब की, जीवनदायिनी है।।

त्रिलोकी ने भी,ली थी पनाह,
यहाँ आकर,तेरे दामन में।
हसीं,बहुत लगती अल्हड़,
अठखेलियाँ ,तेरे आँगन में।।

लिया समेट सभी को तूने,
बस अपने आगोश में।
देखें जो जख्म तेरे दामन के,
मन भर जाता है, रोष में।।

गोरों तक के दिये दर्द भी,
तूने हँसकर झेले हैं।
डच, कुषाण,और पुर्तगाली,
तेरे आँचल से खेले हैं।।

हर रोज देखती है तू सिसकते,
बेबस लाचार,अभागिन को।
कोई झोंक देती ज्वाला में,
कैसे माफ करेगी ,उस नागिन को।।

हैं कितने उपकार तेरे,
कैसे हम,कर्ज चुकाएँगे।
याद करेंगे जब-जब तुझको,
अश्क, छलक कर आएँगे।।

हो गया लहुलूहान ये दामन,
दर्द का कोई छोर नहीं।
तेरे ही तुझको,जख्मी करते,
दूजे कोई,और नहीं।।

कितने जख्म,उभर आये,
आखिर कब तक,सहना होगा।
लगने लगी,साँस थोड़ी सी,
घुट घुट कर ,अब मरना होगा।।

शास्त्रों में भी जन्मभूमि को जननी के समान बताया गया है। पर आज इसका दामन कितना दागदार हो गया।इसका एहसास हमें कब होगा। तो आइये हम सब मिलकर इसे खुबसूरत व पावन बनाकर इसका वही गरिमापूर्ण स्थान प्रदान करें
माँ भारती को शत शत नमन
पृथ्वी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
मेहरानियाँ_ राजस्थानी

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