आलेख

धरा और मनुज

सुषमा श्रीवास्तव

एक वह समय भी रहा होगा जब केवल जल,थल एवं नभ का वर्चस्व रहा होगा और सर्वव्यापी को सृष्टि-संरचना व सृजन का भाव जागा होगा,तभी तो यह विश्व रचा गया।क्या कभी किसी ने सोचा कि यदि विश्व में केवल जल और नभ होता तो क्या होता?
अरे,ये थल रूपी धरा ही वह धैर्यशालिनी महामना,धीरा औ गंभीरा है जो निःसंकोच भाव से सूक्ष्म से सूक्ष्म एवं स्थूल से स्थूलकाय को आह्लादित तन-मन से सबको धारण किए हुए है।
सृष्टिकर्त्ता की सर्वोत्कृष्ट संरचना मनुज ही है जो अपने क्रियाकलापों, आचरणों और विचारों से देव या दानव बन जाता है।उसके अंदर तो नाना प्रकार की संवेदनाएँ  तथा उत्कण्ठाएं पल्लवित- पुष्पित होती हुई विभिन्न शाखाओं-प्रशाखाओं के साथ धरित्री पर अपना वर्चस्व सिद्ध करने को येन-केन प्रकारेण जुटी रहतीं हैं। यही कारण है कि आज मैं धरा चीत्कार उठी हूँ।मेरा रोम-रोम कराह रहा है। आज अगर 5-10  प्रतिशत सुकोमल हाँथ मुझे खुशी और सम्मान देने को आगे बढ़ाए जाते हैें तो 90-95 प्रतिशत कंटीले- खुरदरे हाँथ खरोंच मारने,चोट पहुँचाने से नहीें चूकते हैं। क्यों सबके सब मूक-बधिर व विवेकहीन होकर मेरे साथ-साथ अपना ही सर्वनाश करने को तुले हो? क्या अपने भविष्य और  आने वाली पीढ़ियों का जरा भी ख्याल तुम्हारे मन में नहीं आता? पता नहीं है क्या? अतीत सुहावना,और वर्तमान मन बहलाना है,पर इसी वर्तमान पर तो तुम्हारे भविष्य की राह सजती- संवरती है।तुम जिसे आधुनिकता की चादर कहते हो,स्वयं को विकसितों की कतार में खड़ा करना चाहते हो वह तुम्हारे लिए तब तक छलावा है जबतक अपने सद्विवेक और सुप्रयास का समन्वय नहीं करोगे।जबतक स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ के लिए अपना श्रम-सीकर नहीं बहाओगे।
सुनो, तुम बुरे नहीं हो,तुम तो सर्वोत्तम हो।बुराई है,तुम्हारे विचारों, कर्मों और व्यवहारों में तथा शीघ्रता की पतवारों में। आवश्यकता है इन सबको परिष्कृत और परिमार्जित करने की।जबतक  तुम स्वयं में सुधरने,सुन्दर बनने की इच्छा बलवती नहीं करोगे तबतक इस धरा का करुण-क्रंदन होता रहेगा।तुम सुधरोगे जग सुधरेगा,जग सुधरेगा विश्व खिलेगा।स्व पर विश्वास करो,सब कुछ सुलझेगा। तेरे मन की उलझन रूपी कलिका चटक उठेगी।कालिमा कलुषिता शनैः शनैः धुल-धुल कर निर्मल भव्य हो उठेगी।ऐसा मेरा विश्वास है -:
धरा हूँ धरा मैं तुम्हारी धरा हूँ,
दर्द है मेरा- विघटन-विप्लव तुम्हारा,
आह है मेरी- दुष्कर्म में तुम्हारे,
कण-कण मेरा है, लिए ही तुम्हारे,
जब मैं ही न रहूँगी, तो तुम क्या करोगे?
ये चिंतन करो तुम! ये मंथन करो तुम!

राम राम जय श्रीराम!
सुषमा श्रीवास्तव, मौलिक सृजन, © ® ,रुद्रपुर, ऊधम सिंह नगर ,उत्तराखंड।

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