साहित्य

नफरतों के खंजर

सुन्दर लाल मेहरानियाँ

बिकते गद्दारों के हाथ,सरहदी बंकर देखे हैं।
मिटाने पाप कमों को,लगाते लंगर देखे हैं।

प्यार-#मोहब्बत तो रह गये बनकर फसाने अब
हाथों में अपनों ही के,नफरती खंजर देखे है।

कौन ,किसको ,क्यों गले लगायेगा अब यहाँ,
हर तरफ #बेरूखी के,मंजर देखे हैं।

लगता है टूटकर, बहुत बिखर गया ये जहाँ,
हरिक की आँखों में,अश्कों के समंदर देखे हैं

अपराधी तो बन बैठे,मसीहा मजलूमों के अब,
#सिसकते बेबस-लाचार,जेल के अंदर देखे हैं।

“महक ए धरा” भी न जाने खो गई कहाँ अब
लहलहाते वही खेत हसीं,आज बंजर देखे हैं।

इक फसाना सा बनके रह गई हसीं जिंदगी ये
सिमटते आगोश में काल के ,हरिक सिकंदर देखे हैं।

और अब तू किसे और क्यों समझाने चला है’देव’
होते यूँ छोटी-छोटी बातों पे ही,बडे बवंडर देखे हैं।

सुन्दर लाल मेहरानियाँ_ राजस्थानी

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Check Also
Close
Back to top button
error: Content is protected !!