
तुम्हें अपनों का रहे
हर लम्हां ख़याल,
चाहे बीते कितने भी
दिन, महीने, साल।
22 अप्रैल का ये
दिन भी है कमाल,
मुबारक हो शादी का
तुम्हें ग्यारहवां साल।
हंसना खिलखिलाकर
दिल को गुदगुदा लेना,
कोई रूठ जाए तुमसे
तुम उसे मना लेना।
रूठ कर बैठ जाने से
भला घर कहाँ चलते हैं,
घर में सिर्फ़ कलेश
दिल में नफ़रत पलते हैं।
अपनी गृहस्थी को तुम
इस क़दर से चलाना,
सास को सास न कहना
सिर्फ़ मां कहकर बुलाना।
सास बहू के रिश्ते को
इस तरहा से निभाना,
कभी आँखें दिखाना
कभी सर को झुकाना।
शेख रहमत अली “बस्तवी”
बस्ती (उ.प्र.)




