साहित्य

धरा

गोवर्धनसिंह फ़ौदार 'सच्चिदानन्द'

अपना तू आधार धरा, करती बेड़ा पार है।
तुमसे रोटी-पानी अपना, शुभ सारा परिवार है।।
आह नहीं उफ़ करती तू,नहीं कभी अकड़ती तू।
वन, नदी,पर्वत,सागर,सहती सारा भार है।।

किसको तेरा ख्याल है, लाभ सबहीं ढूँढे अपना।
रौंदे कुड़े कचरे फेंके,आगे उनका अपना सपना।।
देती सबको प्यार बराबर, रखती सबका ध्यान।
सह लेती तू हरदम, वार पर हर वार है।।

तेरी गोदी के हम बच्चे, धरा तुझे हम चाहे।
प्रेम अगाह करते तुमसे, तुमको सदा सराहे।।
अवसर शुभ यह पावन, हिलमिल यह दिवस मनाएँ।
धरा है अपनी जान तू, अपना तू संसार है।।

(गोवर्धनसिंह फ़ौदार ‘सच्चिदानन्द’)
पता :मोरिश्यस।

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