आलेख

शुद्ध वातावरण

नूतन गर्ग

हमारी मॉं धरती जिसे भगवान ने बनाया और अनुपम उपहार के रूप में हमें प्रदान किया या यूं कहूॅं कि हमने उस पर जन्म लेकर अपना जीवन सजा संवार दिया।
हमें सांस लेने हेतु वायु की ज़रूरत महसूस हुई तो वह भी उपहार स्वरूप भगवान ने हमें दी।
अब जीवन है तो…

“बिन पानी सब सूना!
गला मांगे दिन दूना।”

तो नहरें बिछाकर कर दिया सबके कंठो को गीला और तरोताजा।
अब तीन चीजें जो न कर पाईं पूरा उद्धार हमारा क्योंकि…

“लेकर जन्म धरती पर,
सांस भी ली हमने,
तरोताजा किया गले को,
पर न अभी रूका सपना पूर्ण होने का।”

अब पेट की भूख ने मुंह खोला और मांगा अपना हिस्सा। भगवान हमारे जो देते साथ हमेशा आज़ भी रहे खड़े और दे दी हमें अग्नि जैसी पवित्र लौ। जिसको पाकर हम भगवान का धन्यवाद कहते नजर आए।
चार चीजें जो न कर पाईं अपना काम पूरा! अभी भी हमें जरूरत महसूस हुई एक छत की और लगे भगवान को पुकारने। तभी यकायक भगवान को हमारे पुकारने की आवाज का मतलब है समझ आया और आकाश जैसी ठंडक देकर हमें किया कृतार्थ।
अब जब सब कुछ है हमारे पास धरती, वायु, जल, अग्नि और आकाश, जो भगवान ने हमें दी है एक अनोखी सौगात।

एक बात मैं पूछना चाहती हूं सबसे जब ये सब हमारी जरूरत की चीजें हैं, तो हम उनकी देखभाल अच्छे से क्यों नहीं करते हैं?
क्यों हम प्लास्टिक फेंककर इसको दूषित कर रहे हैं? क्यों जगह-जगह थूककर अपनी मॉं के फुंसी-फोड़े बना रहे हैं? क्यों नहाने के बहाने उसमें थूककर, कारखानों का गंदा पानी फेंककर नदियों को दूषित कर रहे हैं? क्यों पहाड़ों को काटकर अंगविहीन कर रहे हैं? क्यों उद्योगों से निकलने वाले जहरीले धुएं से, धूम्रपान करके, कूड़े के ढेर को जलाकर हवा प्रदूषित कर रहे हैं?
क्यों? क्यों? क्यों? आखिर कब तक…?
और भी अनेक कारण हैं जो हमारे भगवान हमसे अपने बनाए पर्यावरण को दूषित करने का हिसाब मॉंग रहे हैं। जीने का सही अर्थ पूछ रहे हैं। हम सब प्राणी आज़ मजबूर हो बस भगवान से यही कहते नजर आ रहे हैं कि…

“अब न होगा कोई अत्याचार हमारी धरती पर,
न ही हमारे जीवन पर,
हम मॉंगते सिर्फ साल में एक दिन सबसे,
ताकी भगवान के बनाए इस पर्यावरण को,
हम तिनका भर तो बचा सकें।”

हम सबको ज्ञात है कि एक दिन से कुछ नहीं होने वाला लेकिन शुरुआत तो एक दिन से ही करनी होती है। इसलिए पर्यावरण को बचाने का यह प्रथम प्रयास है जिसे हर‌ नागरिक बखूबी निभा रहा है और निभायेगा भी। ऐसा मुझे विश्वास है आपका मत कुछ भी हो सकता है!
अब अगर हमें अपने पर्यावरण को और स्वास्थ्य लाभ देना है तो हमें हर रोज़ इस पर काम करना होगा। अपने जीवन को बीमारियों से बचाते हुए शुद्ध वातावरण बनाने में अपना सफल योगदान देना होगा।

नूतन गर्ग (दिल्ली)

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