धरती माँ का कोमल आँचल, जीवन का आधार,
जल, वन, वायु से सजा है, इसका हर आकार।
हरियाली की गोद में पलते सपनों के संसार,
इसके बिना सूना लगेगा, जीवन का विस्तार॥१॥
नदियाँ इसकी धड़कन हैं, पर्वत इसका मान,
मिट्टी में है सोंधी खुशबू, जीवन का सम्मान।
हर प्राणी का एक ही घर, यह अनुपम उपहार,
सहेजें इसे प्रेम से हम, यही सच्चा उपकार॥२॥
कटते वन और बढ़ता धुआँ, संकट का संकेत,
बिगड़ रहा संतुलन सारा, बदल रहा परिवेश।
आओ मिलकर प्रण करें, हरियाली फिर लाएँ,
हर दिन को पृथ्वी दिवस मान, इसे स्वर्ग बनाएँ॥३॥
नन्हे पौधे रोपें सब मिल, जल का मान बढ़ाएँ,
स्वच्छ वायु और निर्मल जल का संदेश फैलाएँ।
धरती माँ की सेवा ही सच्चा धर्म महान,
इसी में है मानवता का उज्ज्वल भविष्य विधान॥४॥
✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”




