साहित्य

विश्व पृथ्वी दिवस पर कुछ पंक्तियां

संजय प्रधान

‌आज विश्व पृथ्वी दिवस पर जरा चर्चा कर लें आज,
रूखी सूखी पृथ्वी है धीमें धीमें ले रही सांस।

बंद करके खुद कमरों में योजनाएं बनाते आप,
हम बचाएंगे धरा को करते हो ये बात।

एक गीतकार थे जो पूछते धरा का कौन है चित्रकार,
जिसने पहनाएं हैं धरा को रंग बिरंगे फूलों के हार।

बहुत सुंदर उपहार मिला था सुंदर पर्यावरण साहब,
झरने नदियां नहरें पानी बहते थे सब मिलकर एक साथ।

भाव है मन में अभी भी बताओ कहां लगाएं वृक्ष आज,
आज इस दिन क्यों खेलते हो हमारे जज़्बातों से साहब।

नदियां प्यासी हो गई सूखी सारी नहरें धाराएं आज,
कूड़ा करकट पत्थर रेत आते हैं नजर बहुत बुरी है ये बात।

जंगल सारे सीमित हुए छीना गया वन्य प्राणियों का निवास,
पेट खातिर आ रहे सारे पशु घर तुम्हारे आज।

सीमेंट का साम्राज्य बढ़ा नमी की थमी सांस,
कीडे़ मकौड़े केंचुएं बताओ किससे करें आस।

पृथ्वी प्रकृति का है मां बेटी का नाता,
अगर बचाना है इन्हें तो करना होगा इनसे वादा।

हरा भरा रहे धरती का हृदयांगन बहे पवन सुगंध,
घर में हो एक डस्टबिन बाहर कुड़ा फैंकने पर लगे प्रतिबंध।

देवभूमि की जीवन्ती बनी रहे लगाओ हल्के पौधे चार,
लग जाएं धनिया पौधिना टमाटर मिर्ची करो सबसे सदव्यवहार।
संजय प्रधान
देहरादून।

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