हो गया प्यारा मुझे वह नाम से,
मन महक उठता सदा श्रीराम से।
प्रेम की खुशबू मिली बस धाम में,
दिल लगा बैठी उसी गुलफाम से।
दूर हो जाता हृदय का दर्द फिर,
रूह को मिलता बड़ा आराम से।
दीप सा जलता रहा विश्वास भी,
घर हुआ रोशन सदा इकराम से।
‘सुरभि’ दुनिया में नहीं आराम है ,
प्रेम सब करते यहाॅं हैं दाम से।
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




