साहित्य

ख़ुशी

पंकज एस पाण्डेय,

बहुत दिनों बाद पकड़ में आई…

“खुशी”..तो पूछा ?

कहाँ रहती हो आजकल…. ?

अब तो मिलती भी नहीं..?

जवाब मिला “यही तो हूँ”!!!

 

बहुत भाव खाती हो खुशी ?..

कुछ सीखो अपनी बहन से…

हर दूसरे दिन आ जाती है,

हमसे मिलने.. “परेशानी”।

 

बोली ख़ुशी –आती तो मैं भी हूं…

पर आप ध्यान नही देते।

“अच्छा”…? कहाँ थी तुम

जब पड़ोसी ने नई गाड़ी ली ?

और तब कहाँ थी जब रिश्तेदार ने

बड़ा घर बनाया?

 

शिकायत होंठो पे थी कि…..

उसने टोक दिया बीच में.

मैं रहती यहीं कभी आपकी बच्चे की किलकारियो में,

कभी रास्ते मैं भी मिल जाती हूँ ..

एक दोस्त के रूप में,

 

कभी एक अच्छी फिल्म देखने में,

कभी.,गुम कर मिली हुई

किसी चीज़ में,

कभी… घरवालों की परवाह में,

तो कभी,मानसून की

पहली बारिश में,

कभी कोई गाना सुनने में,

 

दरअसल थोड़ा थोड़ा

बाँट देती हूँ, खुद को छोटे छोटे पलों में….

उनके अहसासों में।

 

खैर…

अब तो पता मालूम

हो गया ना मेरा…?

ढूंढ लेना मुझे

आसानी से अब

छोटी छोटी बातों में….

**

✍🏼पंकज एस पाण्डेय,

स्वरचित, (शिकोहाबाद )

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