साहित्य

विरह गीत

ममता झा मेधा

तेरे बिन सूना है आँगन,

सूनी हर इक शाम।

याद तुम्हारी बनकर आँसू,

लेती मेरा नाम॥

 

चाँद गगन में रोज़ निकलता,

पर उजियारा कहाँ।

तेरे बिना यह साँस भी जैसे,

जीने का सहारा कहाँ॥

 

पल-पल तेरी राह निहारूँ,

अँखियाँ हुईं अधीर।

बिन सावन बरसें नैना,

भीग गया मन-धीर॥

 

पवन चली तो तेरी खुशबू,

मन को छूकर जाए।

टूटे सपनों की किरचों में,

तेरी छवि मुस्काए॥

 

कब आओगे प्राण-पिया तुम,

बीत गए कितने ऋतु।

विरह-अगन में जलते-जलते,

सूख गई जीवन-स्मृति॥

 

आओ अब तो लौट के साथी,

मत दो इतना दर्द।

प्रेम बिना यह जीवन मेरा,

जैसे सूना पर्व।

ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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