
गर्मी भीषण पड़ रही, अंदर बाहर भाप।
कहर ढा रहा आज भी, सूर्य देव का ताप।।1
जीवन के संघर्ष को, समझ-बूझ लें आप।
घर में भी तो बढ़ रहा, गर्मी वाला ताप।।
देखो सारे लोग अब , धधक रही है आग।
कहता अब जगदीश है, छोड़े भागम भाग।। 3
सूरज देते धूप को, मिले कष्ट आपात।
भूले से निकले नहीं, हृदय मिले आघात।।4
भानु परीक्षा ले रहे, बचे रहें श्रीमान।
बाहर निकलें सोच कर, बची रहेगी जान।।5
गरम हवा अब चल रही, बच के रहिये मित्र।
तपन खींचती जा रही, गर्मी वाला चित्र।।6
सूरज दादा आ गए, करो नहीं व्यायाम।
नित्य सवेरे कीजिये, योगा-प्राणायाम।।7
प्रतिदिन प्रातःकाल में, सदा कीजिये योग।
भोजन ताजा कीजिये, कभी न होंगे रोग।।8
डॉ जगदीश नारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️



