साहित्य

जहां प्रश्न खो जाते हैं, और उत्तर विलीन हो जाते हैं’

डो. दक्षा जोशी'निर्झरा

पूरी सृष्टि का अदृश्य केंद्र प्रेम है, जो मात्र एक भावना नहीं बल्कि वह ब्रह्मांडीय गुरुत्त्वाकर्षण है, जो अस्तित्व को आपस में जोड़े रखता है। जब यह प्रेम अपनी परिपक्वता के चरम बिंदु पर पहुंचता है, तो समर्पण बन जाता है। समर्पण ‘मैं’ और ‘तुम’ के भेद को मिटाकर अहंकार की सीमाएं ढहा देता है; ठीक वैसे ही, जैसे एक बूंद सागर में मिलकर ख़ुद सागर बन जाती है।

समर्पण घटित होते ही बुद्धि के तर्क़, हिसाब-किताब और संदेह समाप्त हो जाते हैं। प्रश्न हमेशा दूरी से जनमते हैं, और जब समर्पण में दूरी ही न बची, तो प्रश्न भी खो जाते हैं। वहीं, उत्तर की खोज़ वहां होती है जहां व्याकुलता हो; लेकिन समर्पण की अगाध तृप्ति में जो जैसा है, उसी में पूर्णता का एहसास होता है, जिससे सारे उत्तर विलीन हो जाते हैं।

“जहां तर्क़ समाप्त होता है, वहीं से श्रद्धा और समर्पण की सूक्ष्म यात्रा शुरू होती है।”

आज का आधुनिक मनुष्य सूचनाओं और प्रश्नों के जाल में उलझकर मानसिक शांति खो चुका है। यह चिंतन हमें संकेत देता है कि जीवन को सुलझाने के बजाय उसे पूरी तरह जीने और सौंपने का साहस करें। “न प्रश्न, न उत्तर” की यह अवस्था अज्ञानता नहीं, बल्कि महा-ज्ञान और मौन की वह पराकाष्ठा है, जहां इंसान सृष्टि का मालिक नहीं, बल्कि स्वयं सृष्टि बन जाता है।

-डो. दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद,गुजरात।

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