साहित्य

मजदूर

डॉ नवनीता दुबे नूपुर

मजदूर दिवस विशेष

“पसीने से तर बितर,
हाथ में कुदाल है
गढ़ते नींव भारत की,
हाल मगर बेहाल है
पौ फटते आँखें मलता,
निकल पड़ा है काम को।
श्रम के बदले रोटी मिलती,
रोज सुबह और शाम को।
ऊंची ऊंची अट्टालिकाएं,
सड़कों का निर्माण करे
खटकर रात दिन फिर वह,
परिवार का पेट भरे ।
उनके श्रम पर नतमस्तक हम,
हर श्रमिक का सम्मान करें ।
एक दिवस नहीं मजदूरों का,
हर दिन उनका मान धरे।
मजदूरों की जिंदगी,
मुश्किल से भरपूर।
,करते नित मेहनत फिर,
दुख से हरदम चूर।।
धरो मान इनका सभी,
मत करना अपमान ।
निर्माता हैं राष्ट्र के,
गढ़ते हिंदुस्तान।।

डॉ नवनीता दुबे नूपुर©®✍️मंडला,मप्र,मौलिक।

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