साहित्य

नौतपा गर्मी

डॉ संजीदा खानम शाहीन

जेठ का महीना आया, सूरज आग उगलने लगा,

धरती तवे सी तपती, नौतपा रंग दिखाने लगा।

सुबह दस बजे से ही, लू के थपेड़े चलें,

पंछी भी पेड़ों पर, छाँव ढूँढते मिलें।

 

सड़कों पर सन्नाटा है, दोपहर कर्फ्यू सी लगे,

AC-कूलर भी हार मानें, पसीना यूँ ही बहे।

मटके का पानी अमृत सा, गले को तर कर जाए,

आम-पना और बेल शरबत, जान में जान लाए।

 

किसान की नजरें टिकीं, आसमान की और,

नौतपा खूब तपा तो, होगी बारिश घनघोर।

कहते हैं बुजुर्ग सारे, ये तपना जरूरी है,

कीट-पतंगे मर जाएँ, धरती की मजबूरी है।

 

पर शहर की दीवारों में, ये गर्मी बस कहर ढाए,

बिजली जाए तो लगे, जैसे साँस ही रुक जाए।

फिर भी उम्मीद बाकी है, कि बादल अब घिरेंगे,

नौतपा के बाद ही तो, सावन के गीत मिलेंगे।

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