
नवतपा की ज्येष्ठ मास की शुरुआत होते ही उत्तर और मध्य भारत में ‘नवतपा’ का आगाज़ हो जाता है, जब सूर्य पृथ्वी के सबसे नज़दीक होने के कारण हवा में आग घोलने लगता है और इस झुलसा देने वाली गर्मी में चलने वाली तीखी ‘लू’ सिर्फ़ असहज़ नहीं करती, बल्कि शरीर को बुरी तरह बीमार और पस्त कर सकती है. इस भीषण दौर में थोड़ी सी भी लापरवाही सेहत पर भारी पड़ सकती है, इसलिए इस मौसम का सामना केवल समझदारी और कड़े बचाव से ही किया जा सकता है. लू के इन जानलेवा झटकों से बचने का सबसे अचूक हथियार शरीर में नमी बनाए रखना है; भले ही प्यास न लगी हो, फ़िर भी हर आधे घंटे में पानी पीते रहना चाहिए और आम का पन्ना, जौ का सत्तू, पुदीने का शरबत, नींबू-पानी, छाछ तथा नारियल पानी जैसे पारंपरिक, शीतल व प्राकृतिक पेयों को अपने दैनिक आहार में शामिल करना चाहिए. इसके साथ ही, दोपहर बारह बजे से शाम चार बजे के बीच, जब सूरज के तेवर अपने चरम पर होते हैं, अनावश्यक रूप से बाहर निकलने से बचें और यदि बाहर जाना बेहद अनिवार्य हो, तो सूती व ढीले-ढाले हल्के रंग के कपड़े पहनकर, सिर को अंगोछे या टोपी से ढककर और आँखों पर धूप का चश्मा लगाकर ही निकलें. खाली पेट धूप में बाहर जाना सीधे बीमारी को बुलावा देना है, इसलिए हमेशा कुछ खाकर और पानी पीकर ही घर से क़दम बाहर बढ़ाएं,यदि धूप से लौटने के बाद अत्यधिक सिरदर्द, चक्कर, कमज़ोरी, जी मिचलाना या तेज़ बुखार के बावजूद पसीना न आने जैसे लक्षण दिखाई दें, तो इन्हें कतई नजरअंदाज न करें,ऐसे पीड़ित व्यक्ति को तुरंत किसी छायादार या ठंडी जगह पर ले जाकर गीले कपड़े से स्पंजिंग करें, ओआरएस (ORS) का घोल या नमक-चीनी का पानी दें और स्थिति गंभीर होने पर बिना देर किए चिकित्सक से परामर्श लें. इस आत्म-रक्षा के साथ-साथ एक सामाजिक और मानवीय समझाइश यह भी है कि इस भीषण गर्मी में बेज़ुबान पशु-पक्षियों का भी विशेष ख़्याल रखा जाए, अपनी छतों, बालकनियों या घर के बाहर मिट्टी के सकोरों में साफ़ पानी रखें और गली के आवारा पशुओं को दोपहर की चिलचिलाती धूप में किसी पेड़ या दीवार की छाया में सुस्ताने दें, उन्हें वहां से भगाएं नहीं. अंततः नवतपा का यह दौर हर साल हमें तपाने आता है, परंतु संयमित खान-पान, उचित परहेज और जागरूक सतर्कता अपनाकर हम इसके थपेड़ों को बेअसर कर खुद को और अपने परिवार को पूरी तरह सुरक्षित रख सकते हैं.




