साहित्य

वो मर गया कब का

दिनेश पाल सिंह

*वो अब भी लौट आए तो कोई फ़र्क़ नहीं,*

*दिल-ओ-दिमाग़ से वो उतर गया कब का।*

 

*अब तुम्हें मुबारक ये मंज़िलें, ये रास्ते,*

*जो साथ चल रहा था, बिछड़ गया कब का।*

 

*मोहब्बतों की बातें अब अफ़साने लगती हैं,*

*ज़माना इश्क़ की इस आग से डर गया कब का।*

 

*ये ख़्वाब अब किसी और की अमानत बन चुके,*

*तुम्हारा दिया हर ख़्वाब बिखर गया कब का।*

 

*तुम पूछती हो अब भी उसी बस्ती का पता,*

*वो गाँव, वो गली, वो शहर उजड़ गया कब का।*

 

*जिसे वफ़ा की मैंने इबादत समझ लिया,*

*वो अपने ही वादों से मुकर गया कब का।*

 

*अब आवाज़ देती हो तो देती ही रहो तुम,*

*जो सुनने वाला था, वो मर गया कब का।*

 

*अब न गिला किसी से है, न कोई शिकवा है,*

*जो दर्द था, वो वक़्त के संग गुज़र गया कब का।*

 

*’दिव्य’ अब राख में मत ढूँढ़ मोहब्बत की चमक,*

*ये दिल तो जल के ख़ाक हुआ, बिखर गया कब का।*

 

*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*

*सम्पर्क 8279709465*

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