
*वो अब भी लौट आए तो कोई फ़र्क़ नहीं,*
*दिल-ओ-दिमाग़ से वो उतर गया कब का।*
*अब तुम्हें मुबारक ये मंज़िलें, ये रास्ते,*
*जो साथ चल रहा था, बिछड़ गया कब का।*
*मोहब्बतों की बातें अब अफ़साने लगती हैं,*
*ज़माना इश्क़ की इस आग से डर गया कब का।*
*ये ख़्वाब अब किसी और की अमानत बन चुके,*
*तुम्हारा दिया हर ख़्वाब बिखर गया कब का।*
*तुम पूछती हो अब भी उसी बस्ती का पता,*
*वो गाँव, वो गली, वो शहर उजड़ गया कब का।*
*जिसे वफ़ा की मैंने इबादत समझ लिया,*
*वो अपने ही वादों से मुकर गया कब का।*
*अब आवाज़ देती हो तो देती ही रहो तुम,*
*जो सुनने वाला था, वो मर गया कब का।*
*अब न गिला किसी से है, न कोई शिकवा है,*
*जो दर्द था, वो वक़्त के संग गुज़र गया कब का।*
*’दिव्य’ अब राख में मत ढूँढ़ मोहब्बत की चमक,*
*ये दिल तो जल के ख़ाक हुआ, बिखर गया कब का।*
*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*सम्पर्क 8279709465*




