
रहता उर में जो सदा, उसके प्रति विश्वास।
कभी दूर होता अगर,बढ़े प्रेम की प्यास।
आंँखें तकती राह है, मिले नहीं है चैन,
प्रिय का जब शुभ आगमन,तब लगता मधुमास।।
कोमल मन की भावना, सहज करो स्वीकार।
प्रेम भरे उद्गार से, सुखी रहे संसार।
बैर हृदय उपजे नहीं, रहे प्रेम के प्यास,
जीवन का आधार है,सृष्टि सृजन विस्तार।।
धर्म धरा का प्रेम है,करना मत बदरंग।
अनुरागी मन रख सदा, भरते चलो उमंग।
हृदय भरा विश्वास हो,रहे प्रेम की प्यास,
जीवन पथ होता सुगम,हर्षित हो हर अंग।।
प्रेम ईश वरदान है,रखिए मेल मिलाप।
स्नेह सिक्त रिश्ते सदा,हर लेते संताप।
खोए कभी न धैर्य को,रहे प्रेम की प्यास,
प्रभु के प्रति आसक्त हो,करो नाम का जाप।।
डॉ गीता पाण्डेय “अपराजिता”
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




