
प्रकृति अनुपम वरदान है, जीवन का आधार,
इसके बिना अधूरा मानव, सूना सारा संसार।
ऊँचे-ऊँचे पर्वत खड़े हैं, गौरव जिनकी शान,
कल-कल बहते झरने गाते, मधुर प्रकृति का गान॥
हरियाली की चादर ओढ़े, वन हैं कितने विशाल,
पशु-पक्षी का सुंदर घर है, अनुपम उनका जाल।
वन देते हैं शीतल छाया, वर्षा का उपहार,
मिट्टी का कटाव रोकते, रखते धरा सँभार॥
जड़ी-बूटी, औषधि, लकड़ी, देते हैं भरपूर,
मानव जीवन को बनाते, स्वस्थ, सुखी, मजबूत।
नदियाँ पर्वत से निकलकर, सींचें खेत-खलिहान,
इनसे ही मुस्काता जग,इनसे ही है जीवन दान॥
शुद्ध वायु और प्राणवायु का, देती अमूल्य दान,
निःस्वार्थ भाव से करती है, सबका कल्याण।
प्रकृति सच्ची मित्र हमारी, हितकारी हर पात,
इसके आँचल में मिलता है, सुख, शांति और छाँव॥
ऋषि-मुनियों ने महिमा इसकी, पहले ही ली पहचान,
इस कारण सनातन संस्कृति में, पाया है उच्च स्थान।
वृक्ष, नदी, पर्वत, वनदेवी, सब हैं पूजित स्वरूप,
प्रकृति के हर रूप में देखा, ईश्वर का ही रूप॥
आओ मिलकर प्रण यह लें, रखें इसका मान,
संरक्षण और संवर्धन से, चुकाएँ इसका ऋण महान।
प्रकृति से ही जीवन है, यह सत्य है इसकी पहचान,
मानव हेतु ईश्वर का यह है सबसे सुंदर वरदान॥
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




