
जुझारू होने का अर्थ सिर्फ यह नहीं होता कि आप किसी संघर्षमय परिस्थिति में घिरे हैं और लगातार जूझ रहे हैं; बल्कि जुझारू होने का असली अर्थ यह है कि ……..
आपके पास जो कुछ भी सीमित संसाधन हैं, उनमें ही संतुष्ट और पर्याप्त रहकर खुद को साबित करना है………
हमारे छपरा शहर में एक चौराहा है
“भिखारी ठाकुर के नाम से चौराहा”। बचपन में जब हम छोटे थे, तो यह नाम सुनने में थोड़ा अजीब लगता था। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे नाम तो आसानी से समझ में आ जाते थे, लेकिन ‘भिखारी ठाकुर’ नाम का अर्थ उस उम्र में पल्ले नहीं पड़ता था। हालांकि, जैसे-जैसे उम्र बढ़ी और समझदारी विकसित हुई, वैसे-वैसे भिखारी ठाकुर की महान उपलब्धियां भी समझ आने लगीं। तब यह अहसास हुआ कि कोई व्यक्ति …..
शून्य से शुरू हुआ सफर तय करके भी सफलता के शिखर तक पहुँच सकता है। आज भिखारी ठाकुर सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि भोजपुरी संस्कृति और जुझारू व्यक्तित्व की एक वैश्विक पहचान बन चुके हैं।
लोक के महानायक और संघर्ष की जीवंत मिसाल
शून्य से शिखर का वास्तविक अर्थ………
जिस अभावग्रस्त और पिछड़े परिवेश में भिखारी ठाकुर ने जन्म लिया था, वहाँ से उठकर कला और साहित्य की दुनिया में ऐसा इतिहास रचना किसी चमत्कार से कम नहीं था। उनके जीवन ने यह साबित कर दिया कि सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए महलों की नहीं, बल्कि अटूट इच्छाशक्ति और हौसले की जरूरत होती है।
समाज का सटीक आईना:
‘विदेशिया’, ‘बेटी-वियोग’ और ‘भाई-विरोध’
जैसी उनकी रचनाओं ने केवल समाज का मनोरंजन नहीं किया, बल्कि समाज के भीतर मौजूद कुरूपताओं, पलायन के दर्द और पारिवारिक टूटन को बहुत ही बेबाकी से सबके सामने रखा। उन्होंने आम जनमानस की भाषा और उनकी पीड़ा को अपनी कला की धुरी बनाया।
छपरा की माटी का गौरव……
छपरा (सारण) की इस पावन माटी ने देश को कई रत्न दिए हैं, लेकिन भिखारी ठाकुर का स्थान सर्वोपरि है। छपरा का वह चौराहा सिर्फ एक भौगोलिक पहचान नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि एक साधारण सा दिखने वाला इंसान भी अपनी मेहनत और जुझारूपन से इतिहास रच सकता है।
आज के दौर में प्रासंगिकता
आज के समय में जब युवा हर छोटी-बड़ी असफलता से निराश हो जाते हैं, तब भिखारी ठाकुर का जीवन और उनका संघर्ष एक मजबूत प्रकाशस्तंभ की तरह मार्गदर्शन करता है। यह इस बात का प्रमाण है कि परिस्थितियों का रोना रोने से बेहतर है कि जो संसाधन आपके पास हैं, उन्हीं का इस्तेमाल करके अपनी एक अलग लकीर खींची जाए।
भिखारी ठाकुर और उनका वह चौराहा हमें यह सिखाता है कि सफलता पद या पैसों से नहीं, बल्कि आपके द्वारा समाज को दिए गए योगदान और आपके अटूट संघर्ष से आंकी जाती है।
अभिलाषा श्रीवास्तव गोरखपुर




