
1.)हर समय पर दूसरों की सहायता के लिये उपलब्ध होकर हम खुद अपने लिये मुसीबत पैदा करते हैं।हर समय पर दूसरों के लिये उपलब्ध रहकर हम अपनी कमजोरी और उनकी धींगामुश्ती के बारे में सूचना देने का काम करते हैं।जिनकी आप पूरे भाव से सहायता करते हैं,वो ही लोग अधिकांशतः आपकी पीठ के पीछे आपका उपहास करते हैं।वो आपको निरा मूर्ख और भोला कहते हैं। व्यावहारिक तो यह है कि आप उन्हीं के लिये उपलब्ध रहें,जो मुसीबत में आपकी सहायता के लिये उपलब्ध रहते हैं।शोषक, कपटी और छली नकली दोस्तों के बनाये जाल में फंसने से बचें, ताकि कल आपको धोखा मिलने पर परेशान न होना पड़े। दिक्कत यह है कि जितने हम संवेदनशील और करुणामय हैं, आवश्यक नहीं है कि दूसरे भी आपके प्रति संवेदनशील और करुणामय हों।ये बातें केवल थ्योरिटिकल नहीं होकर जीवन की वास्तविकता है। इसका विपरीत भी उतना ही सच है।आप भी दूसरों के हर समय उपलब्ध होने का अनैतिक रुप लाभ न उठायें।जिस व्यवहार की आशा आप दूसरों से करते हैं, वैसा ही व्यवहार दूसरों के साथ आप भी करें। आज से 5100 वर्षों पहले महाभारत में भी स्पष्ट कहा गया है –
‘आत्मन: प्रतिकुलानि परेषाम् न समाचरेत्’- ( उद्योगपर्व)।
2.) परफोर्मेंस के नाम पर हमारे शिक्षा संस्थानों में भद्दे, अश्लील और वासना को भड़काने वाले फिल्मी गाने गाये जा रहे हैं।यह सब माता- पिता,भाई -बहन और शिक्षकों के सामने होता है। क्या प्रतिभा का प्रदर्शन केवल भड़काऊ और सैक्सी गानों और शरीर को कामुक ढंग से मटकाकर ही होता है?इसका कोई अन्य ढंग नहीं है क्या? प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालयों और प्रौद्योगिकी संस्थानों में यही हो रहा है। शिक्षा संस्थानों में किसी भी तरह का उत्सव या फंक्शन हो- बस युवाओं की वासना को भड़काया जा रहा है। वहीं युवा जब बाहर या भीतर छेड़खानी और बलात्कार आदि करते हैं तो फिर पुलिस और न्यायालय आ जाते हैं। पहले अपराध करने के लिये युवाओं को प्रेरित करो और जब आपराधिक कुकर्म करने लगें तो फिर उनको जेलों में ठूंस दो। लगता है कि जैसे युवाओं के साथ सिस्टम द्वारा कोई षड्यंत्र चल रहा हो।अब तो हालात इतने खराब हो गये है कि रामलीला, रासलीला, रामकथा,कृष्णकथा,गीताज्ञानयज्ञ आदि में भी खुलेआम भौंडे, भद्दे, अश्लील, भड़काऊ और कामुक गाने गाकर भीड़ इकट्ठी की जाती है। स्पेशल महिला डांसरों को इसके लिये बुलाया जाता है। राजनीतिक दलों द्वारा आयोजित रैलियों में तो यह साधारण सी बात हो गई है। नैतिकता, अनुशासन, संयम आदि को तिलांजलि देकर कामवासना ही सब कुछ हो गई है। सिस्टम के नेता, अधिकारी और धर्मजगत् के धर्मगुरु, कथाकार, संत, स्वामी लोग भी इस युवा विरोधी षड्यंत्र में सम्मिलित हैं। नैतिक मूल्यों की तो जैसे पूरी तरह से हत्या ही कर दी गई है।भारत में नृत्य,वादन और गायन लाखों वर्षों से 64 कलाओं में विद्यमान रहे हैं। लेकिन वहां पर प्रतिभा को उजागर करने के लिये होता है,न कि कामवासना को भड़काने के लिये या फिर रैलियों और कथाओं में भीड़ बढ़ाने के लिये। आजकल तो योग शिविरों तक में अश्लील डांस करके योगाभ्यासियों का मनोरंजन करवाया जाता है। तथाकथित हमारे बड़े लोग कितना नीचे गिरेंगे – कहना मुश्किल है। आपने अभी देखा नहीं कि कैसे तमिलनाडु की एक महिला उच्च पुलिस अधिकारी एक दस वर्ष की बच्ची की बलात्कार की रिपोर्ट को पढ़कर कैसे खिलखिलाकर हंस रही है।यह है हमारी भारतीय पुलिस की संवेदनहीन, क्रूर और अमानवीय तस्वीर।हमारी पुलिस अब भी मैकाले युग में जी रही है, जिसमें हिंदुस्तानी लोग कीड़े, मकोड़े और भोग की वस्तु से अधिक कुछ भी नहीं हैं। इन्हें नैतिकता, भारतीयता, मानवीयता की शिक्षा और संस्कार दिये ही नहीं जाते हैं।
3.)भारत में योग और योगाभ्यास को लगभग व्यापार बना दिया गया है। ऋषिकेश जैसी योगनगरी कहे जाने वाले तीर्थस्थल पूरी तरह से योग की आड़ में व्यापारिक स्थल और पर्यटन स्थल बन चुके हैं। हालांकि भारत में स्थित अधिकांश तीर्थस्थलों और तीर्थस्थलों पर स्थित योग केंद्रों की हालत धन- दौलत और माया केंद्रित हो चुकी है लेकिन ऋषिकेश का सबसे अधिक बुरा हाल है।एक एक सप्ताह के योग-शिविर लगाकर देशी -विदेशी लोगों को योग शिक्षक और योगाचार्य के प्रमाण पत्र धड़ल्ले से बांटे जा रहे हैं।एक ठीक-ठाक योग शिक्षक और योगाचार्य बनने के लिये दशकों की शास्त्रीय शिक्षा, तपस्या, अनुशासन,संयम, साधना और सात्विक आहार -विहार का पालन आवश्यक होता है लेकिन ऋषिकेश जैसी तीर्थस्थलों पर ऐसा कुछ भी दिखाई नहीं देता है। देशी और विदेशी तथाकथित नकली योग -शिक्षक,योगाचार्य,संत,स्वामी,
संन्यासी, धर्मगुरु, शंकराचार्य, महामंडलेश्वर आदि सनातन योग विद्या को गलत ढंग से प्रचारित कर रहे हैं। इन्हें सिर्फ अपने व्यापार और भव्य आश्रमों की शानो-शौकत से मतलब है, कोई योगाभ्यास कर रहा है या नहीं कर रहा है – इससे इन्हें कोई मतलब नहीं है। उन्मुक्त भोगी और विलासी लोगों का योग- संसार पर कब्जा हो गया है।
)पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि चौदह वर्ष से अधिक की गाय को काटकर उसका मांस खाना और बेचना वैध है।यह है इनकी गौभक्ति।यह है इनका गोमाता प्रेम।ये अपने आपको सनातनी हिन्दू कह रहे हैं। इन्हें शर्म बिल्कुल नहीं आती है। सही बात तो यह है कि इनके लिये गाय न पशु है,न माता है,न सनातन हिन्दू प्रतीक है तथा न ही गाय का कोई आध्यात्मिक महत्व है। इनके लिये गाय, गंगा, गायत्री, गीता, गणेश, गोदावरी आदि सभी वोट बैंक हैं। इनको बस वोट चाहियें।वोट चाहे गाय का मांस बेचकर मिलें,गाय की आड़ में दूसरे मजहबों के प्रति वैमनस्य फैलाने से मिलें,मोब लिंचिंग करके मिलें या फिर बजरंग दल जैसे नकली संगठन खडे करके गाय की आड़ में धींगामुश्ती करने से मिलें। सबसे दुखद तो यह है कि सत्ताधारी राजनीतिक दल के समर्थक तथाकथित संत, स्वामी, संन्यासी, मुनि, योगी, कथाकार, शंकराचार्य, ज्ञानानंद,गीतानंद आदि सभी चुप्पी साधे बैठे हैं। इनको गाय की रक्षा से अधिक अपना पद, अपनी प्रतिष्ठा सरकारी सुविधाएं, अपने आलीशान मठ और आश्रम प्यारे हैं। यदि इनमें सनातन के प्रति थोड़ी भी भक्ति होती तो ये सरकार के विरोध में खड़े होकर विरोधस्वरूप धरना- प्रदर्शन करते तथा सरकार को झुकाते।ये ऐसा कभी नहीं करेंगे।ये खुद ही गौमांसभक्षी हैं।ये खुद ही गाय काटने वाले कत्लखानों के मालिकों से अरबों रुपए का चंदा लेते हैं।अब की बार मुस्लिम कम्य्यनिटी ने भी इनको फंसा दिया है। मुस्लिमों ने ईद के अवसर पर गाय की कुर्बानी का विरोध कर दिया है। ईद पर हिंदू गाय को कटने हेतु बेचने को खड़े हैं लेकिन मुस्लमान मना कर रहे हैं।वो कह रहे हैं कि गाय को राष्ट्र पशु घोषित करो।जब हिन्दू और मुस्लमान दोनों गाय को राष्ट्र पशु घोषित करने पर सहमत हैं तो अब अपने आपको हिंदुवादी कहने वाली सरकार गाय को राष्ट्र पशु घोषित क्यों नहीं कर रही है? जनता के सामने इनके हिंदू विरोधी होने का असली रहस्योद्घाटन तो अब हुआ है।ये वास्तव में सनातनी हिन्दू हैं ही नहीं।ये अपने विभिन्न दलों के जन्म से ही हरेक अवसर पर इन्होंने अपने आपको ईसाईयत समर्थक सिद्ध किया है।इनका सौ वर्षों का इतिहास सनातनी विरोधी और ईसाईयत सयर्थक रहा है। सावरकर के शुरुआती समय को छोड़कर बाकी का सारा कालखंड इनके सभी संगठनों का सनातन हिन्दू विरोधी और ईसाईयत समर्थक रहा है। सन् 1947 ईस्वी के आजादी के संग्राम से पहले और बाद में इनका रवैया ऐसा ही घृणित रहा है। यदि तुम गाय को पशु न मानकर माता मानते हो तो इसे गौमाता घोषित कर दो। इससे गाय की रक्षा होगी, भरपूर घी -दूध -मक्खन -शीत की व्यवस्था हो जायेगी। और गाय की आड़ लेकर आये दिन होने वाले दंगे फसाद भी बंद हो जायेंगे।एक वर्ष में गौमांस बेचकर 35000 हजार करोड़ रुपये का व्यापार करवाने वाले , गंगा को गंदा नाला बना देने वाले, श्रीमद्भगवद्गीता को सड़कछाप पुस्तक बना देने वाले तथा योग -विद्या को लाखों करोड़ रुपये का व्यापार बनाकर उसके सनातन स्वरूप को खत्म कर देने वाले लालची और भ्रष्ट लोग गाय को न तो राष्ट्र पशु घोषित करेंगे तथा न ही गौमाता घोषित करेंगे।
4.)महर्षि दयानंद सरस्वती ने इस युग में सर्वप्रथम गाय को बचाने के लिये
‘गौकरुणानिधि’ पुस्तक लिखी थी। लेकिन गाय को माता कहने वाले तथा गाय के लिये सर्वाधिक पुरुषार्थ करने वाले आर्यसमाजी नेताओं का भी लालच, स्वार्थ और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण बुरा हाल है। इन्होंने भी अब धोती उतारकर चड्डी पहन ली है। आर्यसमाज ने गौमाता की रक्षा के लिये सर्वाधिक आंदोलन और कार्यकर्ता दिये हैं।इनका भी अब असली चेहरा सामने आ आ गया है।दे दो अपने राजनीतिक पदों से इस्तीफा और बचाओ गौमाता को। धर्मनगरी कहे जाने वाली भूमि कुरुक्षेत्र भूमि जहां पर गौपालक भगवान् श्रीकृष्ण ने गीतोपदेश दिया था, वहां पर गौमाता, प्राकृतिक खेती, गुरुकुल शिक्षा और गीता की आड़ में अपना धंधा करने वाले तथाकथित नकली आचार्य और धर्माचार्य चुप्पी धारणा किये बैठे हैं। पाखंड को छोड़कर आओ मैदान में। इतने धन -दौलत को कहां लेकर जाओगे? महर्षि दयानंद सरस्वती और भगवान् श्रीकृष्ण को ही याद कर लो।ये आलीशान भव्य पांच-सितारा होटलनुमा तुम्हारे आश्रम और गुरुकुल धरे के धरे रह जायेंगे।गौहत्यारी सरकार, गौहत्यारे नेताओं और गौहत्यारे धर्माचार्यों का विरोध करो। सनातन -धर्म, संस्कृति, दर्शनशास्त्र, योग,अध्यात्म,वेद, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद्गीता और जीवन-मूल्यों की तभी रक्षा हो पायेगी।
5.) गुरमीत राम रहीम को 16 वीं बार पैरोल मिल गई है। इन महोदय का जेल में भीतर -बाहर का जाना -आना महंगा पड़ रहा है। इनको जेल की चाबियां ही पकड़ा दो,जब चाहेंगे भीतर चले जायेंगे तथा जब मन करेगा जेल से बाहर आ जायेंगे।ये हर महीने का क्या ड्रामा बना रखा है?इस प्रक्रिया में सरकार, प्रशासन और जनता का भी समय,धन और मानव बल व्यय होता है।अन्य कैदियों के समानांतर जब इन महोदय को अलग से अतिरिक्त अधिकार प्राप्त हैं,तो छोड़ो यह कानून और संविधान का दिखावा। अन्यथा हजारों अन्य कैदियों को भी इन्हीं की तरह पैरोल देने की व्यवस्था करो। हमारे देश के धर्मगुरुओं, सुधारकों, नेताओं, उच्च अधिकारियों, न्यायविदों, उद्योगपतियों,कोरपोरेट घरानों के लिये कानून अलग हैं, जबकि जनसाधारण के लिये अलग कानून हैं।लिखतम से क्या होता है -धरातल पर जो हो रहा,वही सच है।लिखतम के अनुसार तो भारत का सिस्टम शायद एक प्रतिशत ही चल रहा है। बाकी निन्यानवे प्रतिशत में साधन-संपन्न, शक्तिसंपन्न और धनसंपन्न प्रभावी लोगों की धींगामुश्ती चल रही है।वो पुलिस, प्रशासन,कानून, न्यायालय, न्यायाधीश आदि सबको प्रभावित करके अपने मनमाफिक निर्णय करवा लेते हैं।
6.) लगता है कि गुरमीत राम रहीम रहते तो अपने पांच-सितारा आलीशान आश्रम में ही लेकिन कभी कभार जेल में साधना करने के लिये चले जाते हैं।क्या मजाक बना रखा है कानून का?पता नहीं कानून ही गलत है या ठीक कानून का दुरपयोग किया जा रहा है या फिर न्यायधीश और न्यायालय ही इन बलात्कारियों और हत्यारों के प्रभाव में हैं – जो भी इस पर बोलेगा,उसी को राष्ट्रद्रोही घोषित कर दिया जायेगा।होना तो यह चाहिये कि इन बलात्कारियों और हत्यारों को जेल में कड़ी निगरानी में रखकर इनसे कोल्हे चलवाये जाते। लेकिन ऐसे प्रभावी लोग जेल में रहें या जेल से बाहर रहें,इनकी अय्याशी में कोई फर्क नहीं पड़ता है।इनकी सेवा के लिये अनेक हनीप्रीत,अनेक विधायक,अनेक सांसद,अनेक मंत्री,अनेक उच्च अधिकारी,अनेक दौलतमंद पलक पांवड़े बिछाए तैयार रहते हैं।ये शायद हरियाणा जैसे राज्य में हो रहा है, जहां पर हत्यारे, बलात्कारी और देशद्रोही नकली धर्मगुरुओं के पैरों में जनता जनार्दन के साथ विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता भी पड़े रहते हैं। न्यायालय ऐसे लोगों के खिलाफ स्वत: संज्ञान क्यों नहीं लेता है? लेकिन यहां तो स्वयं न्यायाधीश भी इन बाबाओं के चरणों में नतमस्तक रहते हैं।हमारी न्यायपालिका,कार्यपालिका और विधायिका को करोड़ों युवाओं की गरीबी,बदहाली,शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोजगारी, बिमारी, आत्महत्या, भूखमरी,हताश मानसिकता आदि की समस्या कोई समस्या नहीं है।इनके लिये तो समस्या है गुरमीत राम रहीमों,रामपालदासों,बृजभूषणों,संदीप कुमारों को कैसे सजा होने से बचाया जाये या फिर जेलों में भी उन्हें पांच-सितारा सुविधाएं प्रदान की जायें। भारत के कानून द्वारा सजा प्राप्त या मुकदमे चल रहे हत्यारों, बलात्कारियों और देशद्रोहियों का सम्मान करते हुये केवल भारत में देखा जाता है,अन्य किसी देश में नहीं।पैरोल मिलने पर,जमानत होने पर या सजा काटकर जेल से बाहर आने पर अपराधियों का स्वागत होते हुये देखा जा सकता है।भारत को पतन और बर्बादी के गड्ढों में कहां ले जाया जा रहा है?इसका अर्थ तो यह हुआ कि हमारे भारत के करोड़ों अंधभक्त और हजारों नेता भारत के संविधान और कानून को मानते ही नहीं हैं।सजा हो जाने पर भी ये मानते हैं कि हमारे हत्यारे, बलात्कारी और देशद्रोही गुरु या नेता निर्दोष हैं। न्याय व्यवस्था भी इस अपराध पर चुप्पी साधे बैठी है। क्या न्यायालय को इस पर स्वत: संज्ञान नहीं लेना चाहिये कि जो भी नागरिक या नेता या कार्यकर्ता अपराधियों, बलात्कारियों, हत्यारों और देशद्रोहियों का सम्मान करता हुआ पाया गया, उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की जायेगी।
7.) लेकिन हमारे यहां इसका विपरीत होता देखा जा सकता है। खिलाड़ियों को खेलने से रोका जाता है।विद्यार्थियों को पढ़ने से रोका जाता है। शोधकर्ताओं को शोध करने से रोका जाता है। शिक्षकों को तार्किक और अभिनव करने से रोका जाता है।किसानों को खेती-बाड़ी में तरक्की करने से रोका जाता है। जनमानस को निरोग और स्वस्थ होने से रोका जाता है। पुलिस को सत्यनिष्ठ होने से रोका जाता है। नागरिकों को राष्ट्रभक्त होने से रोका जाता है। भारतीयों को राष्ट्रभाषा भारती हिंदी को अपनाने से रोका जाता है। सनातनियों को सनातनी होने से रोका जाता है।गाय, गंगा, गीता, गोदावरी को अपनी रक्षा करने से रोका जाता है। भूखों को पेट भरने से रोका जाता है। विचारकों को वैचारिक स्वतन्त्रता से रोका जाता है। लेखकों को निष्पक्ष और जमीनी लेखन से रोका जाता है।नकलरहित परीक्षाओं को रोका जा रहा है। निष्पक्षता से होने के लिये चुनावों को रोका जा रहा है। अधिकारियों और कर्मचारियों को समर्पण से काम करने से रोका जाता है। रचनात्मक और सृजनात्मक पर रोक है, जबकि विध्वंसात्मक और नकारात्मक को खूली छूट मिली हुई है। अखबारों और टीवी चैनलों को शायद मालूम ही नहीं है कि निष्पक्ष, सत्यनिष्ठ और राष्ट्रवादी पत्रकारिता क्या होती है। अधिकांशतः मिलकर भ्रष्ट सिस्टम की चापलूसी करने में लगे हुये हैं। लेकिन ध्यान रहे कि जब भी सिस्टम द्वारा प्रायोजित भ्रष्टाचार,दमन, ज़ुल्म,अत्याचार, अनाचार, बेरोजगारी, भूखमरी, अपराध, लूटपाट, बेईमानी, तानाशाही की अति हो जाती है,तो क्रांति, बदलाव और विद्रोह होना आवश्यक हो जाता है।हरेक तानाशाही का अंत बदलाव, क्रांति और विद्रोह में होना अवश्यंभावी है।
………..
डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र-विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र-136119




