साहित्य

मर्यादा की सीमा कभी लाँघना नहीं 

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र

मर्यादा न क़ैद है, न दीवार,

ये है संस्कार की ऊँची मीनार,

बोलने से पहले तोले शब्दों को,

समझो रिश्तों के अनमोल अर्थों को।

 

आँखें झुकाना कमजोरी नहीं,

बड़ों का आदर असली वीरता है,

क्रोध आए तो मौन धारण करना,

जो मर्यादित आचरण का है गहना।

 

हँसी में भी न उड़े किसी का मान,

तर्क में भी न टूटे प्रेम का वितान,

अधिकार से पहले कर्तव्य निभाना,

यही सीख है रामायण की मर्यादा।

 

सोशल मीडिया पर उँगली उठे उससे

पहले सोचना, शब्द तीर बन जाते हैं,

स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं,

मर्यादा की सीमा कभी लाँघना नहीं।

 

मर्यादा में रहकर ही मुस्कुराना,

भीड़ में सबसे अलग दिखना है,

न ओछे बोल, न दिखावे का शोर,

चरित्र की खुशबू फैले हर ओर।

 

चूँकि राम बने मर्यादा पुरुषोत्तम,

इसलिये सीता बनी धैर्य की मूरत,

मर्यादा न होती, घर-घर कलह होता,

समाज ये बस स्वार्थ का शहर होता।

 

तो आओ वचन लें आज अपने मन से,

आचरण हो ऊँचा, न गिरे किसी क्षण से,

क्योंकि पद, पैसा, रूप सब छूट जाएगा,

आदित्य बस मर्यादित नाम रह जाएगा।

 

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र

‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’

‘विद्यासागर’, लखनऊ

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