
चले जा रहा हूंँ ना मंज़िल का पता है
ना रास्तों का,
मंज़िल मिलेगी या नहीं किसको पता,
तनहाई में मैं जिए जा रहा हूंँ!!
घर की आहट से बे-ख़बर हूंँ
ना जाने कौन होगा फ़लसफ़ा
ज़िन्दगी का,गढ़े जा रहा हूंँ!!
शायद इसी को ज़िन्दगी कहते हैं
अपनी उलझनों से नज़रे चुरा रहा हूंँ!!
सुकून दिल को मिलना मुश्किल
ख़ुद ही से ख़ुद को बचा रहा हूंँ!!
उल्फ़त का रंग धीरे-धीरे उतर रहा है
ध्यान सारा ख़ुद पर लगा रहा हूंँ!!
गुमनाम बस्ती में कोई मिल जाए
रह गुज़र को मैं रास्ता दिखा रहा हूंँ!!
हम ना सही वह ही कुछ पा जाए
नसीबो के यूंँ ही चक्कर लगा रहा हूंँ!!
रास्ते मांँग रहे हैं पल-पल का हिसाब
वास्ता मंज़िलो क्या मैं दिए जा रहा हूंँ!!
चले जा रहा हूंँ ना मंज़िल का पता है
ना रास्तों का..!!
स्वरचित- राजीव त्रिपाठी
उदयपुर राजस्थान




