साहित्य

सुकून

रिया राणावत 

सुकून की चाह ,

सच्ची है चाह ।

लाख भटके फिर उमड़े ,

कोशिशें हजार की सबने।

सुकून! सुकून!

हर कोई तरसता,

सुकून को ही मंजिल समझता ।

सुकून के लिए ना कोई मंज़ित बना है, ना कोई मंदिर ।

सुकून बसता है अंतरात्म में,

जहां छोड़ , सब जगह ढूंढ रहे हो तुम।

लाखों की आबादी में , सुकून को पैसा मान लिया है।

किया पता क्यों अपने मन को विचलित बना लिया है।

सुकून तो हर कण में बसा है,

थोड़ा कम थोड़ा ज्याद लगा है।

 

 

रिया राणावत

कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)

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