साहित्य

हरियाणा में हरियाणवीं भाषा की उपेक्षा : एक समीक्षात्मक अध्ययन

डॉ. सुरेश जांगडा

हरेक समाज की आत्मा उसकी भाषा में बसती है। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि एक पूरी संस्कृति, परंपरा और पहचान की प्रतीक होती है। भारत जैसा विविधतापूर्ण देश भाषाई और सांस्कृतिक समृद्धि का केंद्र है, जहाँ प्रत्येक राज्य अपनी भाषा को मान-सम्मान देता है। परंतु यह दुर्भाग्य की बात है कि हरियाणा जैसे सांस्कृतिक रूप से संपन्न राज्य में अपनी मातृभाषा हरियाणवीं को वह स्थान नहीं मिला, जिसकी वे अधिकारी हैं। यह स्थिति केवल भाषाई उपेक्षा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जड़ों से कटने की चेतावनी है।

हरियाणा की जनता जिस भाषा में सोचती, बोलती, हँसती और काम करती है, वही हरियाणवी है। यह भाषा लोकगीतों, कहावतों, कहानियों और लोकनाट्यों के माध्यम से समाज के दिल में रची-बसी है। फिर भी शिक्षा व्यवस्था में इसका स्थान लगभग नाममात्र का है। राज्य के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में हरियाणवी को एक वैकल्पिक विषय के रूप में रखा गया है, परंतु वास्तविकता यह है कि हरियाणवी का प्रश्नपत्र भले हो, पढ़ाई और परीक्षा दोनों हिंदी में होती हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दिखाती है कि हरियाणवी को आज भी स्वतंत्र भाषा के रूप में नहीं, बल्कि हिंदी की उपबोली के रूप में देखा जाता है। जब किसी भाषा को केवल औपचारिक मान्यता दी जाती है, पर व्यवहार में उसे प्रयोग में नहीं लाया जाता, तो वह धीरे-धीरे अपने अस्तित्व को खो देती है। आज हरियाणवीं के लिए पाठ्यपुस्तकों, शिक्षकों और संस्थागत प्रयासों का अभाव उसकी सबसे बड़ी समस्या है। इसके कारण नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर होती जा रही है और अपने लोक-संसार से अपरिचित होती जा रही है। आज स्थिति यह है कि बहुत से ऎसे स्कूल भी हैं जहां पर हरियाणवीं भाषा बोलने पर पूर्णतया प्रतिबंध है और यदि कोई विद्यार्थी हरियाणवीं बोलता हुआ पाया जाता है उस पर जुर्माना तक लगाया जाता है।

यह प्रश्न अत्यंत स्वाभाविक है कि हरियाणा में हरियाणवीं को अपना अधिकार क्यों नहीं मिला। इसके पीछे कई सामाजिक, शैक्षणिक और नीतिगत कारण हैं। सबसे पहले तो हरियाणवी को संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिला है। जब तक यह संवैधानिक मान्यता प्राप्त नहीं करती, तब तक इसे शिक्षा या प्रशासन में स्वतंत्र भाषा के रूप में प्रयोग करना कठिन है। इसके अतिरिक्त स्वतंत्रता के बाद से हिंदी और अंग्रेज़ी को शिक्षा व प्रशासन का प्रमुख माध्यम बना दिया गया। इससे क्षेत्रीय भाषाएँ पीछे छूट गईं। समाज में भी हरियाणवी को अक्सर “गंवारों की भाषा” कहकर नीचा दिखाया जाता है। यह मानसिकता भाषा के प्रति हीनभावना पैदा करती है। जब तक समाज स्वयं अपनी भाषा को गौरव से नहीं अपनाएगा, तब तक सरकारी प्रयास भी अधूरे रहेंगे। एक और बड़ा कारण आधुनिक शिक्षा की नौकरीपरक प्रवृत्ति है। आज की शिक्षा प्रणाली का मुख्य उद्देश्य रोजगार प्राप्त करना बन गया है। अंग्रेज़ी और हिंदी को रोजगार की भाषा माना जाता है, इसलिए मातृ भाषाएँ शिक्षा और समाज के मुख्य प्रवाह से बाहर होती जा रही हैं।

इन भाषाओं के पुनर्जीवन के लिए कई ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। सबसे पहले हरियाणवी को राज्य की द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए और उसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए केंद्र सरकार से अनुशंसा की जानी चाहिए। विद्यालयों में हरियाणवी माध्यम से पढ़ाई शुरू की जाए, उसके लिए पाठ्य पुस्तकें तैयार की जाएँ और शिक्षकों का विशेष प्रशिक्षण दिया जाए। हरियाणवीं लोकसाहित्य, गीत, नाटक और कविताओं को विद्यालय स्तर पर सम्मिलित किया जाए। मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर भी हरियाणवीं भाषा में सामग्री उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि नई पीढ़ी तक इनका प्रसार हो सके।

हरियाणा की मिट्टी में भाषा, संगीत और संस्कृति की गहरी जड़ें हैं। लेकिन यदि हरियाणवीं को शिक्षा और समाज में सम्मानजनक स्थान नहीं मिला, तो ये जड़ें धीरे-धीरे सूख जाएँगी। भाषा का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। हरियाणवी को “बोली” नहीं, बल्कि “पहचान” मानने की आवश्यकता है। जब हरियाणा अपने बच्चों को अपनी भाषा में सोचने और बोलने की स्वतंत्रता देगा, तभी वह अपनी सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रख सकेगा। आजकल स्थिति ऎसी हो गई है कि काफी माता-पिता हरियाणवीं बोलने से बच्चों को हतोत्साहित करते है। हरियाणवीं बोलने पर शिक्षक ऐसे देखते हैं जैसेकि किसी अति पिछड़े देशों सोमालिया, जांबिया आदि के नागरिकों को देख रहे हों।

इसलिए यह प्रश्न कि — “हरियाणा में हरियाणवीं से इतना विरोध क्यों है?” — केवल भाषाई नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और आत्मगौरव का प्रश्न है। जब तक हरियाणा अपनी भाषाओं पर गर्व करना नहीं सीखेगा, तब तक उसकी सांस्कृतिक पहचान अधूरी रहेगी। हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान उसकी मातृभाषा हरियाणवी से गहराई से जुड़ी हुई है, परंतु शिक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था में इन दोनों भाषाओं को उचित सम्मान नहीं मिला है। हरियाणवी को अभी तक केवल बोली मानकर शिक्षा से बाहर रखा गया है तथा उसकी आत्मा को ही कमजोर किया जा रहा है। यह स्थिति राज्य की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करती है। आवश्यकता है कि हरियाणा सरकार हरियाणवीं को आधिकारिक दर्जा दे, विद्यालयों में इसका शिक्षण शुरू करे इसे पुनः जीवंत शिक्षण भाषा बनाए। मातृभाषा में शिक्षा से बालक का बौद्धिक व सांस्कृतिक विकास होता है। जब हरियाणा अपनी भाषाओं को सम्मान देगा, तभी वह अपनी सांस्कृतिक अस्मिता और गौरव को सुरक्षित रख सकेगा।

 

डॉ. सुरेश जांगडा

राजकीय महाविद्यालय सांपला

रोहतक (हरियाणा)

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