
बेटा नौकरी पर शहर चला गया,
माँ-बाप का घर सूना पड़ा गया।
बहू को सास की बात चुभने लगी,
रिश्तों में दरार यहीं से बढ़ने लगी।
पहले दादा जी कहानी सुनाते थे,
अब मोबाइल में सब खो जाते हैं।
बीमारी आई तो खर्चा भारी,
दवाई-नर्स घर पर ना संभल पायी।
पति-पत्नी दोनों ऑफिस जाते,
बूढ़े माँ-बाप अकेले घबराते।
अकेलेपन से डर लगता है,
वृद्धाश्रम में हमउम्र मिलता है।
पहले बुजुर्ग घर की शान थे,
अब बच्चों को वो बोझ से लगते हैं।
टाईम नहीं, पैसा नहीं, सब्र नहीं,
इसीलिए आश्रम के गेट खुलते कहीं।
पर याद रखो ये बात सभी,
कल तुम भी बूढ़े होगे कभी।
माँ-बाप का साया अनमोल है,
वृद्धाश्रम ना हो,बस घर गोल है।
मौलिक, स्वरचित
डॉ संजीदा खानम शाहीन



